“जिल्ले हुमा का राज़: हवेली, साया और एक अनकही किस्मत का बोझ”

 



हशिम इस बात  से बेखबर था कि इन सब की मौजूदगी में कोई और भी है जो हाशिम की हर हरकत को नोट कर रहा है।

कोई और है जो इस वक्त यहां सिर्फ इसलिए मौजूद है कि वह हाशिम का दीदार कर सके।

जिल्ले हुमा जाओ जाकर  बाहर सबको यह चाय देकर आओ।

एक मुलाजिमा  ने उसे चाय की ट्रै पकढ़ाते हुए कहा।

उसने बिना कुछ कहे उसे ट्रै को पकड़ लिया।

और आहिस्ता आहिस्ता खुद को संभालती हुई ट्रे को संभाल कर पकड़ कर चलने लगी।

क्योंकि जिस तरह से वह अपने लिबास को पहने रखती थी? उस तरह उसे बहुत संभाल के चलना पड़ता था।

सब लोग अपनी बातों में मग्न थे ,हाशिम को छोड़कर  वो बहुत गौर से उसे देख रहा था।

इसलिए जिल्ले हुमा ने चाय की ट्रै मेज पर रख दिया।

और वह वापस जाने के लिए मुढी।

सुनो हाशिम ने उसे रोकते हुए कहा।

जिल्ले हुमा ने कुछ जवाब नहीं दिया ।

बस खामोश होकर रुक गई।

उसका दिल बहुत जोर जोर से धड़कने लगा था।

अपने दुपट्टे को संभाल कर जाओ ,क्योंकि अगर तुम्हारा दुपट्टा तुम्हारे पैरों के बीच में आ गया, तो तुम गिर सकती हो? 

हाशिम ने उसे आगाह करते हुए कहा।

क्योंकि जिल्ले हुमा के दुपट्टे का एक सिरा उसके पैरों के नीचे आने वाला था?

उसने बिना देर किया अपने दुपट्टे का पल्लू ठीक किया। और तेज तेज कदमों से जाने लगी।

हाशिम सोचने लगा उसके बारे में अजीब तरह की मुलाजिमा थी वह।

जो खुद को पूरी तरह से काले लिबास में छुपा कर रखती थी।

क्या वजह हो सकती है इसकी? 

वह सोचने लगा था इस बारे में।


जिल्ले हुमा की जिंदगी से जुड़ा एक बहुत बड़ा सच्च था जिससे नवाब साहब बाकीफ थे।

या फिर रहमत बीबी बाकीफ थी। 

और किसी तीसरे शख्स को,  जिल्ले हुमा की जिंदगी के बारे में कुछ नहीं पता था।

रहमत बीबी इस   इस हवेली की बहुत पुरानी मुलाजिमा थी। 

जो नवाब साहब के राज से अच्छी तरह से वाकिफ थी। नवाब साहब की जिंदगी से जुड़े कुछ राज ऐसे थे।

  जो रहमत बीबी जानती थी।

इस राज को, बेगम साहिबा भी नहीं जानती थी।

और नवाब साहब का ही हुकुम था ,कि जिल्ले हुमा को इस हवेली में होने के बाद भी कोई देख ना पाए।

इस हवेली के किसी शख्स की नजर भी जिल्ले हुमा पर पढ़नी नहीं चाहिए।

नवाब साहब।

हुकुम देकर रहमत बीवी से यह बात कही थी।

और रहमत बीवी ने उनकी इस बात को हमेशा 

माना था।


हवेली मे मुलाजिमो के लिए बाहर की तरफ  क्वार्टर थे।

जिसमें मुलाजिमों के लिए सारी सुविधाएं उपलब्ध थी लगभग।

जिल्ले हुमा छोटे से क्वार्टर में उदास बैठी थी।

वह अपने सर को अपने घुटनों में रखकर सोच रही थी।

अजीब किस्म की जिंदगी थी उसकी।

ना तो किसी से कुछ बोल सकती थी। 

ना किसी से हंस की बातें कर सकती थी। 

उसकी वालिदा को यह सब पसंद नहीं था।

उसका मन करता था, दूसरे लोगों से बात करने का। 

मगर उसकी वालिदा उसे यह कहकर, इन सब चीजों से दूर रखा था।

के नवाब साहब को यह सब पसंद नहीं।

मुलाजिमों को अपनी औकात में रहना चाहिए। 

उन्हें ज्यादा हंसने बोलने का कोई हक नहीं होता है।

इसकी एजुकेशन कंप्लीट हो चुकी थी। 

अब उसका इस हवेली से जाना, बंद हो गया था।

और अपनी एजुकेशन को हासिल करने के लिए, भी वह बहुत डरते डरते से हवेली से बाहर जाया करती थी। 

और अपने क्लास के किसी भी स्टूडेंट से बात करने का उसको हक नहीं था।

जहां नवाब साहब के रूल्स कुछ बातों में बहुत सख्त थे। वहीं कुछ बातों में नवाब साहब के रूल्स अपने मुलाजिमो के लिए बेहतर थे।

कि अगर मुलाजिमों के बच्चे पढ़ना चाहे। तो उन्हें पूरी आजादी थी पढ़ने की। 

जिसका सारा खर्चा खुद नवाब साहब उठाते थे।


इस वक्त जिल्ले हुमा ने अपने सर से उस काले, चादर नुमा दुपट्टे को हटा के रख दिया था।

अपने खूबसूरत लंबे सुनहरी बालों को खोलकर। वह खामोश बैठी थी।

और सोच रही थी की हवेली में, उसकी उम्र की भी लड़कियां है।

कितनी खुशहाल है उनकी जिंदगी कितनी आजादी से वह जिंदगी गुजरती है। 

उनके लिए कहीं कोई रोक-टोक नहीं है।

लेकिन जिल्ले हुमा  पर, जमाने भर की बहुत रोक-टोक थी। 

उसकी बड़ी-बड़ी सुनहरी।

आंखों में आंसू आ गए थे।

अभी वह यही सोच रही कि , दरवाजे पर दस्तक होने लगी।

उसने हड़बड़ाते हुए अपने दुपट्टे को तलाश करना शुरू किया।

उसका दुपट्टा उसकी खाट की सराहना पर रखा हुआ था। उसने वह दुपट्टा उठाकर सर तक ढक लिया, और दरवाजा खोलने के लिए आगे बड़ी।

अस्सलाम वालेकुम।

दरवाजा खोलते ही उसकी वालिदा  उसके सामने थी। वालेकुम अस्सलाम उन्होंने मुस्कुरा कर जवाब दिया ।

और क्वार्टर के अंदर आ गई।

क्या हुआ जिल्ले हुमा तुम आज हवेली से इतनी जल्दी वापस क्यों आ गई? 

रहमत बीबी  ने देखा कि जिल्ले हुमा की आंखों में आंसू थे।

अम्मी जान , कुछ तबीयत अच्छी महसूस नहीं हो रही थी।

और हवेली का काम भी खत्म हो गया था तो मैंने सोचा अपने कॉव्टर में जाकर आराम कर लू।

जिल्ले हुमा ने अपनी आंखों से आंसू को छुपाने की कोशिश की।

सच में यही बात है, या फिर कोई और बात है। 

उसकी वालिदा, उसको गौर से देखती हुई बोली।

जी हां  यही बात है ,और क्या बात होगी?

जिल्ले हुमा ने कहा।

आप हाथ मुह धोकर आ जाइए मैं आपके और अपने लिए खाना निकाल कर लाती हूं।

जिल्ले हुमा ने कहा।

तो उन्होंने हां मैं गर्दन हिलाई।

जिल्ले हुमा को महसूस होता था जैसे उसे किसी ने सजा का हुकुम सुनाया हो।

वो जो ज़िन्दगी जी रही थी ।

उस ज़िन्दगी मे उसके लिए सिर्फ अन्धेरा ही अन्धेरा था।

उसकी वालिदा को उसका ज्यादा हसना बोलना पसंद ही नही  था।

जिल्ले हुमा की जिन्दगी का सच 

आगा जान और इस हवेली से जुड़ा हुआ था।

ये ऐसा सच था जिसके बारे मे जिल्ले हुमा भी कुछ नही जानती थी।

ना तो अपनी मर्जी के कपड़े पहन सकती थी वो

ना अपनी मर्ज़ी से रह सकती थी वो।

उसकी जिन्दगी खुद के लिए ही चैलेंज थी।

जिसे जिल्ले हुमा ने जबर्दस्ती एक्सेप्ट कर लिया था।

वो खामोशी से सब सह रही थी


आखिर क्यो जिल्ले हुमा की जिन्दगी आजमाइश से भरी थी।

वो कौन सा ऐसा सच था।

जो जिल्ले हुमा भी नही जानती थी,जानने के लिए पढ़ते रहिऐ


                            कंदील


⭐ Next — Short part


अगली सुबह हवेली में अजीब सी हलचल थी।

हाशिम देर रात तक बेचैन था—उसे समझ नहीं आ रहा था कि जिल्ले हुमा की खामोश मौजूदगी उसे इतने गहरे क्यों छू गई।

उधर जिल्ले हुमा अपने छोटे से क्वार्टर में नींद से ज़्यादा डर लेकर जागी थी…

क्योंकि रातभर उसे ऐसा लगा जैसे कोई उसके दरवाज़े के बाहर खामोश खड़ा था।

पर कौन?

हवेली में कौन ऐसा था जो उसे देख रहा था—जब देखने की इजाज़त किसी को नहीं थी?

रहस्य अब और गहराने वाला था…

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