कंदील और डॉक्टर बख्श – एक रहस्यमयी मुलाक़ात और हवेली का राज़
जब डॉक्टर बख्श वॉशरूम से फ्रेश होकर बाहर निकले तो कंदील उनका, वेट कर रही थी।
और चाय की ट्रे कंदील के हाथ में थी जिसमें दो कप चाय थे।
डॉ बख्श सोफे पर बैठ गए, और चाय का कप उठाकर अपने होठों से लगा लिया।
कंदील भी चाय को पीने लगी।
कल रात आप दरवाजे से नहीं, खिड़की से मेरे कमरे में दाखिल हुए थे
कंदील बोली।
जी हां मोहतरमा क्या करता ,सीधे रास्ते तो कोई आपके कमरे में मुझे आने नहीं देता।
तो मजबूरन इस रास्ते ही ,मुझे आपके कमरे में आना पड़ा?
डॉ बक्श ने कहा।
मगर अब आप इस रास्ते से नहीं जाएंगे आप सीधे दरवाजे से जाएंगे।
कंदील ने कहा।
अगर मैं सीधे रास्ते से गया तो कोई मुझे देख भी सकता है जाते हुए।
डॉक्टर बख्श, चाय का सिप लेते हुए बोले।
अब उसकी टेंशन मत लीजिए क्योंकि अभी लगभग सारे मुलाजिम सो रहे हैं।
और हवेली में कोई और मौजूद नहीं है?
आप आराम से दरवाजे से जाइए।
कंदील ने चाय का कप खत्म करते हुए कप ट्रे में रखते हुए कहा।
जो हुकुम मिसेज बख्श।
डॉक्टर बख्श ने एक प्यार भरी नजर कंदील पर डालते हुए कहा।
डॉ बख्श भी अपनी चाय खत्म कर चुके थे।
कंदील और डॉक्टर बख्श ,दोनों ही एक साथ सोफे से उठ कर खड़े हो,गए दरवाजे से बाहर जाने के लिए।
अगर सारे ही मुलाजिम सो रहे हैं, फिर चाय किसने बनाई।
डॉ बख्श चलते हुए कंदील से पूछ रहे थे।
मैंने बनाई चाय कंदील ने कहा।
ओहहहहह तभी मैने सोचा
चाय में नमक इतना तेज कैसे हो गया?
डॉक्टर बख्श ने कन्दील से कहा।
चाय में नमक क्या मतलब?
कंदील डॉक्टर बख्श को घूरते हुए देख रही थी।
मतलब परमानेंट तो डेली चाय बनाती नहीं होगी आप, आज चाय बनाई तो आपने ,उसमें नमक तेज कर दिया।
डॉक्टर बख्श कंदील को छेड़ रहे थे।
जी नहीं इस वक्त अपने लिए चाय में खुद बनाती हूं ।
किसी की जरूरत नहीं पड़ती है मुझे।
कंदील ने कहा।
वह दोनों बातें करते-करते, टेरिस से नीचे उतर चुके थे।
बहुत बड़ी-बड़ी सीढ़ियां थी कंदील के टेरिस की।
कंदील आपकी हवेली किसी भूतिया हवेली से कम नहीं है।
डॉक्टर बख्श, सीढीओ के इधर-उधर देखते हुए बोले।
क्या बेतूकी बात बोले जा रहे हैं सैफ आप?
मुझे तो अपनी हवेली का डेकोरेशन बहुत अच्छा लगता है।
और आगा जान ने इसको बदलवाया भी नहीं है ;उन्हें पुराना डेकोरेशन अच्छा लगता है।
और हम सब की भी यही आदत हो गई है, पुराना डेकोरेशन हम लोगों को भी अच्छा लगता है।
कंदील ने कहा।
कंदील मै आपसे मजाक कर रहा था ।
आपकी हवेली का डेकोरेशन वाकई बहुत अच्छा है।
डॉक्टर बख्श मुस्कराकर बोले।
अब वह दोनों दरवाजे के बिल्कुल नजदीक आ चुके थे।
और हां आप चाय बहुत अच्छी बनाती हो।
डॉक्टर बख्श की आंखों में शरारत थी।
कंदील उन्हें देखकर मुस्कुराने लगी।
डॉ बख्श दरवाजे से बाहर निकल चुके थे।
कंदील ने उन्हें देखकर बाय कहा।
उन्होंने भी अपना हाथ, दूर से हिलाते हुए बाय कहां?
डॉ बख्श अपनी गाड़ी में बैठे ,और और उन्होंने अपनी गाड़ी को स्टार्ट कर दिया।
कुछ ही पल में वह कंदील की नजरों से औझल हो चुके थे।
कंदील ने मुस्कुरा कर अपने सर को झटका।
कंदील ने महसूस किया कि डॉक्टर बख्श को कंदील को चिढ़ाने में बहुत मजा आता था।
आज बड़ा अजीब लग रहा था, कंदील को क्योंकि पूरी लाइफ में फर्स्ट मर्तबा ऐसा हुआ था कि कंदील को बिना किसी के साथ?
अकेले ड्राइनिन्ग टेबल पर नाश्ता करना पड़ रहा था।
वझह यह थी की हवेली का कोई भी शख्स हवेली में मौजूद नहीं करता।
कंदील बेदिली से नाश्ता कर रही थी, हालांकि उसका मन बिल्कुल नहीं चाह रहा था।
उसे हवेली के सारे लोग बहुत ही याद आ रहे थे।
तीन दिन से किसी को भी उसने देखा नहीं था।
इस बात का उसे वह बहुत एहसास हो रहा था ।
कि इस वक्त यहां कोई मौजूद नहीं है।
वह कांटे से प्लेट में एप्पल को तोड़ते हुए जंग कर रही थी क्योंकि कुछ खाने का मन तो उसे नहीं हो रहा था ।
फिर भी फॉर्मेलिटी पूरी करना भी जरूरी है?
क्या बात है कंदील बीबी, नाश्ते को अपने?
खाया ही नहीं है अभी तक।
एक मुलाजिमा काफी देर से कंदील को देख रही थी उसकी हरकत को नोट कर रही थी।
कि वह कुछ खा नहीं रही है ,बस प्लेट में चम्मच चला रही थी।
कुछ नहीं बस आज खाने का मन नहीं हो रहा है ।
तो सोचा बिना नाश्ता कर ही मैं हॉस्पिटल चली जाऊं। कंदील। चेयर पर से उठाते हुए बोली।
तभी डोर बेल पर बेल बजने लगी।
कंदील बहुत ज्यादा खुश हो गई थी।
वह समझ गई थी की, हवेली के सारे लोग वापस आ चुके हैं।
जाऐ हशमत बीबी ,बहुत जल्दी जाइए और हवेली का दरवाजा खोलिए ।
लगता है सारे लोग वापस आ चुके हैं, कंदील दोबारा अपनी जगह पर बैठ गई थी।
जिन लोगों की वजह से वह बहुत तन्हा महसूस कर रही थी वह सब लोग आ चुके थे।
कंदील सोच रही थी, कि लाएबा को अपने और डॉक्टर बख्श के बारे में सारी बातें बताएगी।
और आगा जान से भी यह बात करेगी ,कि डॉक्टर बख्श और उसके बीच में सुलह हो चुकी है अब।
अभी वह यही सोच रही थी, कि मुलाजिम दो बड़े-बड़े। बैग लेकर अंदर आया।
इतने बड़े बैग थे कि उस मुलाजिम से खींच भी नहीं रहे थे।
मुलाजिम के पीछे उसे शख्स को देखकर कंदील खुश होते हुए, लगभग भागती हुई उसे शख्स के नजदीक आई।
आगा जान आ गए आप आगा जान।
कंदील खुश होते हुए उसे शख्स के नजदीक आ चुकी थी।
मगर अपने सामने इस अनजान शख्स को देखकर कंदील की हंसी गायब हो चुकी थी।
क्योंकि जो शख्स सामने था, कन्दील के वह बिल्कुल उस शख्स से अनजान थी।
उसे नहीं जानती थी कि वह कौन है?
आप ,कौन हैं आप?
कंदील ने सवालिया नजरों से देखते हुए उस शख्स से पूछा।
यही सवाल अगर मैं आपसे पूछूं मैडम की आप कौन है तो?
उस शख्स ने कंदील को उल्टा जवाब देते हुए कहा।
क्या बेतूकी बात है, सर आप मेरी हवेली में खड़े हैं मेरी प्रोपर्टी पर खडे है ।
और मुझसे ही सवाल कर रहे हैं कि मैं कौन हूं?
कंदील को उसके बेतूके के सवाल पर गुस्सा आ गया था। यही तो मैं आपसे कहना चाह रहा हूं कि आप मेरी हवेली पर खड़ी है मेरी प्रोपर्टीज पर खड़ी है और मुझे यह सवाल कर रही है कि कौन हूं मैं?
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कंदील कुछ पल तक उस अजनबी को देखती रह गई — उसके चेहरे की झुर्रियों में जैसे कोई पुराना दर्द छिपा था। आँखों में ठहराव था, मगर उनमें एक अजीब-सी ठंडक भी थी। हवेली के हॉल में सन्नाटा पसरा हुआ था, बस दीवारों पर लगी घड़ी की टिक-टिक गूंज रही थी।
कंदील के हाथों में अब भी कॉफी का कप था, जो धीरे-धीरे ठंडा पड़ चुका था।
“क्या मतलब आपका... ये हवेली आपकी है?”
कंदील की आवाज़ में झुंझलाहट के साथ हल्का डर भी शामिल था।
“मतलब वही जो आपने सुना, बीबी... ये हवेली अब मेरी है। और आप?” उसने हल्की मुस्कराहट के साथ कहा — “आप शायद यहाँ अब मेहमान हैं।”
कंदील के चेहरे से रंग उड़ गया। वह समझ नहीं पा रही थी कि ये मज़ाक है या सच।
हर कोना, हर दीवार — जहाँ उसकी यादें बसी थीं, आज किसी अजनबी के नाम की हो चुकी थी।
उसके मन में सवालों का तूफ़ान उठ चुका था — आगा जान कहाँ हैं? हवेली की मिल्कियत अचानक कैसे बदल गई? और डॉक्टर बख्श… क्या वो इस सब से वाकिफ़ थे?
हवेली का माहौल जैसे धीरे-धीरे रहस्यमय होता जा रहा था…
कंदील को अब लगने लगा था कि आज की ये सुबह, उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़ लेकर आई है।
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