"डॉ. बख्श और कंदील की कहानी — प्यार, गलतफहमियाँ और एक खतरनाक साज़िश"

 



तुम्हें रुखसत कराने की इजाजत कंदील, तुम्हारे आगा जान से इजाजत लेकर तुम्हें अपने साथ अपने घर लेने जाने की इजाजत कंदील।

डॉ बख्श ने कहा।

डॉ बख्श के इन लफ्जों से कंदील इस हद तक शर्मा गई थी।

उसने अपने दोनों हाथों से अपने मुंह को छुपा लिया।

डॉक्टर बख्श को उसकी इस अदा पर हंसी आ गई थी।

अगर आप मुझसे भी इसी तरह शर्माएंगी मिसेज बख्श। तो फिर आगे हमारे बच्चों का क्या होगा? 

डॉ बक्श  उसके कानों के नजदीक अपने होठों को लाते हुए बोले।

डॉक्टर बख्श के इन अल्फाजों से कंदील डॉक्टर बख्श से घेरे से निकलकर जाने लगी।

लेकिन उनके घेरे से निकलना इतना आसान काम नहीं था।

  उन्होंने पीछे से कंदील का हाथ पकड़ लिया।

आज मुझे जवाब चाहिए  ,कंदील की कब मैं तुम्हें लेने तुम्हारी हवेली पर आऊं?

डॉक्टर बख्श बोले।

सैफ प्लीज मेरा हाथ छोड़िए , कंदील की आवाज बहुत धीमी निकल रही थी।

पहले मेरी बात का जवाब दे दो, फिर मैं तुम्हारा हाथ छोड़ दूंगा कंदील।

डॉ बक्श ने कहा।

आज जाने क्यों डॉक्टर बख्श को जिद हो गई थी, कंदील के मुंह से यह लफ्ज सुनने की, कि वह कब उसकी इजाजत के साथ उसे रुखसती करके अपने घर ले आए?

सैफ मैं आगा जान को बोल दूंगी।

आपका पैगाम उन जान तक पहुंचा दूंगी।

कंदील ने कहा।

मगर डॉक्टर बख्श की तरफ नहीं देखा ,क्योंकि कंदील में अब इतनी हिम्मत नहीं थी, कि डॉक्टर बख्श की तरफ देख सकती?

आपका बहुत-बहुत शुक्रिया मिसेज बख्श। 

डॉ बक्श ने कंदील के कान के पास फिर सरगोशी की।

  डॉक्टर बख्श की सरगोशी से कंदील के जिस्म में हलचल होने लगती थी।

डॉक्टर बख्श प्लीज मेरा हाथ छोड़ दीजिए।

कंदील ने रिक्वेस्ट भहरे लहजा में डॉक्टर बख्श से कहा। ओके मोहतरमा लीजिए।

डॉ बक्श ने कंदील का हाथ छोड़ दिया।

और डॉक्टर बख्श के हाथ छोड़ते ही, कंदील इतनी तेजी से बाहर की तरफ भागी। मानो के दोबारा डॉक्टर बख्श उसको पकड़ लेंगे।


डॉ बख्श को उसके इस तरह भाग कर जाने पर हंसी आ गई। 

लेकिन अगले ही लम्हे डॉक्टर बख्श के माथे पर शिकन आ गई।

क्योंकि डॉक्टर समीर की कही हुई बात? डॉक्टर बख्श कानों में गुन्ज रही थी।

डॉक्टर बख्श की बर्दाश्त से बाहर थी,ये बात के डॉक्टर समीर ने कन्दील को प्रपोज किया था।

  जो हरकत डॉक्टर समीर ने कन्दील के साथ रात को की थी।

डॉक्टर बख्श का बस नहीं चल रहा था ,कि वह डॉक्टर समीर को जान से मार दें। 

लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकते थे वो मजबूर थे

उनको बर्दाश्त नहीं था, कि कोई भी उनकी वाइफ के ऊपर गंदी नजर से देखें।

तो फिर डॉक्टर समीर ने तो कंदील को टच किया था।

तो फिर डॉक्टर बख्श डॉक्टर समीर को कैसे छोड़ सकते थे?।

जहां इतनी बड़ी गलतफहमी थी ,कंदील और डॉक्टर बख्श में।

लेकिन फिर भी दोनों की छोटी सी बात करने पर यह गलतफहमी दूर होती नजर आ रही थी। 

कंदील और डॉक्टर बख्श की नजदीकियां, बढ़ रही थी।

और इस बार इन नजदीकियों की खुशी कंदील को भी हो रही थी।

डॉ बख्श को इस बात की तसल्ली थी, कि कंदील को उसकी नज़दीकियों से कोई दिक्कत नहीं है।

सालों बाद दोनों में नजदीकी आई थी।


एक तरफ डॉक्टर बख्श और कंदील की नजदीकियां बढ़ती जा रही थी ।

वहीं दूसरी तरफ कोई डॉक्टर बख्श और कंदील को चैलेंज करने की कोशिश कर रहा था।

क्योंकि सब लोग वाकिफ नहीं थे ,कि इस बात से डॉक्टर बख्श और कंदील इतने नजदीक आने लगे हैं?

   नवाब साहब यह वह सारे पेपर्स हैं, जो कंदील के आने वाले फ्यूचर के लिए आपने तैयार करवाए थे।

इन पेपर्स में सारी डिटेल मौजूद है।

और इस पेपर में यहां लिखा हुआ है कि कंदील पर किसी की भी जोर जबरदस्ती नहीं चल सकती ।

वह चाहे तो अपनी जिंदगी के फैसले खुद कर सकती है। लिहाजा कोई भी उसे मेंटली या फिजिकल टॉर्चर नहीं कर सकता।

नवाब साहब के वकील ने जो पेपर्स नवाब ने तैयार करवाए थे उनको तैयार करके, नवाब साहब को थमाते हुए कहा।

क्योंकि नवाब साहब को कंदील के फ्यूचर की बहुत फिक्र थी? 

कंदील इस वक्त  जिस सिचुएशन से गुजर रही थी।

तो नवाब साहब को डर था, कि किसी जोर जबरजस्ती में आकर कंदील कोई गलत फैसला ना ले ले। 

आपका बहुत-बहुत शुक्रिया वकील साहब हम आपके तहे दिल से शुक्रगुजार हैं ।

आपने यह पेपर्स  तैयार करके  हमे दे दिए। 

नहीं तो हमें कंदील की बहुत फिक्र हो रही थी। 

इस वक्त नवाब साहब, बहुत बेफिक्र नजर आ रहे थे।

मगर नवाब साहब एक बहुत जरूरी बात बताना है आपको,  आप ने यह पेपर्स तैयार तो हो गए हैं, लेकिन अगर इन पेपर्स पर दो लोगों के साइन नहीं हुए तो यह पेपर्स रर्दी के अलावा कुछ नहीं है। 

वकील साहब ने कहा।

यह बात सुनकर नवाब साहब के माथे पर बल पड़ गए थे।

कंदील के साइन तो हम आसानी से करवा सकते हैं।

मगर वह दूसरे साइन बहुत मुश्किल है करवाना। 

नवाब साहब ने कहा।

मैं जानता हूं, नवाब साहब की वह दूसरे साइन करवाना बेहद मुश्किल काम है। 

लिहाजा आपको धोखे से उन पेपर्स पर साइन करवाना पड़ेगा।

वकील साहब ने कहा।

नवाब साहब कुछ लम्हा खामोश हो गए।

फिर उन्होंने अपनी पॉकेट से अपना मोबाइल निकला। 

और कोई नंबर डायल करने लगे। 

चन्द लम्हों में ही वह फोन रिसीव हो गया था।

सुनो बारखुरदार मैंने वह पेपर्स तैयार करवा लिए हैं।

  तुम्हें उन पर साइन करना है।

नवाब साहब ने कहा।

नहीं नहीं अगर इस बार तुमने कोई आना कानी की। 

तो तुम अपनी जान से हाथ धो सकते हो। 

दूसरी तरफ से जाने क्या कहा गया जब नवाब साहब ने यह लफ्ज कहे?

नहीं अभी नहीं अभी कन्दील  मौजूद नहीं है ।

वो सिटी से बाहर, अस्पताल की तरफ से कैंप में गई है। नवाब साहब ने कहा।

हां हां जरूर उसके आते ही यह पेपर्स पर साइन हो जाना चाहिए।

नवाब साहब ने हुक्म सुनाया। 

और फोन को कट कर दिया।

क्या हुआ नवाब साहब मान गया यह शख्स?

वकील साहब ने कहा।

नहीं वकील साहब यह इतना आसानी से मानने वाला नहीं है।

लेकिन मैं भी इससे पेपर्स पर साइन करवा कर ही मानूंगा।

नवाब साहब ने अपनी छड़ी को जमीन में टिकेट हुए कहा।

वह नहीं चाहते थे, अब उनकी वजह से या, किसी और की वजह से कंदील की जिंदगी में कोई भी परेशानी आए। लिहाजा वो इस किस्से को जल्द से जल्द खत्म कर देना चाहते थे।

नवाब साहब कम से कम एक बार कंदील  की राय मालूम करना जरूरी थी।

कि इन पेपर्स को बनवाने से पहले अगर एक बार आप कंदील से पूछ लेते तो बेहतर रहता।

क्योंकि कंदील को ईल्म ही नहीं है कि आपने यह पेपर्स तैयार करवाए हैं?



Padhiye agle part me, kandeel ke kya hota hai 

“डॉ. बख्श और कंदील — अगला मोड़”


कंदील के जाने के बाद कमरे में बस उसकी खुशबू रह गई थी।

डॉ. बख्श ने अपनी उंगलियों को देखा — वही हाथ, जिनसे कुछ पल पहले उन्होंने उसका हाथ थामा था।

उनकी आँखों में एक अजीब बेचैनी थी...

जैसे कोई डर, कोई अनकही बात उन्हें भीतर से तोड़ रही हो।


अचानक कमरे का दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।

वहां नवाब साहब के ख़ास आदमी खड़े थे — हाथ में एक लिफ़ाफ़ा लिए।

"यह आपको नवाब साहब ने भेजा है, डॉ. बख्श," उसने कहा और चला गया।


डॉ. बख्श ने लिफ़ाफ़ा खोला — अंदर वही काग़ज़ात थे, जिनकी बात उन्होंने कभी नहीं की थी।

कंदील का नाम, उसके हस्ताक्षर, और नीचे एक खाली जगह —

जिस पर उनका नाम लिखा होना था।


उनके हाथ काँप उठे।

“यह... ये क्या चाल है, नवाब साहब?”

उन्होंने खुद से कहा।


बाहर आंधी चलने लगी थी।

और ठीक उसी वक़्त —

कंदील का फोन आया।

आवाज़ काँप रही थी —

"सैफ... मुझे लगता है किसी ने मेरे कमरे में कुछ रखा है... शायद कोई मुझे रोकना चाहता है..."


कॉल कट गई।

डॉ. बख्श के दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं।

उन्हें एहसास हुआ — अब ये खेल सिर्फ़ इज़्ज़त या मोहब्बत का नहीं रहा...

अब बात ज़िंदगी और मौत के बीच अटकी थी।

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