Kandeel Unspoken Love Story in the Hills"




🌙 कहानी: आधी रात की मुलाक़ात

उसका फ़ोन बजने लगा।
और इस वक़्त क़ंदील का बिल्कुल मन नहीं था किसी से बात करने का।
सुबह से अब तक की थकान ने उसे निढाल कर दिया था।
वो बस थोड़ी देर सुकून से सोना चाहती थी।

लेकिन फ़ोन करने वाला भी कुछ ज़्यादा ही ज़िद्दी लग रहा था —
एक बार कॉल कट होने के बाद दोबारा रिंग बज उठी।
क़ंदील ने बेदिली से उठकर मेज़ पर रखा फ़ोन उठाया।
स्क्रीन पर नाम चमक रहा था — डॉ. समीर।

उसने रिसीव बटन दबाया, और उनींदी आवाज़ में बोली —
“जी डॉक्टर समीर?”

“क़ंदील, मुझे आपसे बहुत ज़रूरी बात करनी है,”
डॉ. समीर की आवाज़ में हिचक थी।

“सुबह कर लेंगे ना बात? इस वक़्त तो नींद से आंखें भी भारी हैं,”
क़ंदील ने जम्हाई लेते हुए कहा।

“नहीं, डॉक्टर क़ंदील... ये बात बहुत ज़रूरी है।
मैं कई दिन से कहना चाह रहा था, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।”

“ठीक है, तो अब बता दीजिए क्या बात है?”
क़ंदील ने हल्के झुंझलाहट भरे लहजे में कहा।

“नहीं, ये बात मैं फ़ोन पर नहीं कह सकता,”
समीर की आवाज़ थोड़ी धीमी हुई।

“तो फिर कैसे बताएंगे डॉक्टर समीर?”
क़ंदील अब उलझ गई थी — आखिर ऐसा क्या था जो आधी रात में कहा जा रहा था।

“आप टेंट के बाहर आ जाइए... बस कुछ देर के लिए।
मैं बाहर ही हूँ, सामने वाले रास्ते पर।”

“बट, डॉक्टर समीर... रात बहुत हो चुकी है।
इस वक़्त बाहर मिलना ठीक नहीं लगेगा। सुबह बात कर लेते हैं।”
क़ंदील ने नर्मी से मना किया।

“क़ंदील प्लीज़... कुछ देर के लिए आ जाइए।
बहुत ज़रूरी है, वादा करता हूँ ज़्यादा टाइम नहीं लूँगा।”

समीर की आवाज़ में एक बेचैनी थी।
वो अपने दिल के हाथों मजबूर था — उसने ठान लिया था कि आज सब कह देगा।

क़ंदील ने लंबी साँस ली।
“ठीक है... आती हूँ बाहर।”

वो सोचने लगी —
“आख़िर ऐसी कौन-सी बात है जो समीर सुबह तक भी नहीं रोक पाए?”
बिस्तर छोड़ने का मन बिल्कुल नहीं था, पर उसके आग्रह ने उसे उठा दिया।

यह एक पहाड़ी इलाका था।
रात में ठंडी हवा चल रही थी।
क़ंदील ने अपने नाइट सूट के ऊपर शॉल ओढ़ी और टेंट से बाहर निकली।

बाहर का मंजर वाक़ई हसीन था —
हर तरफ़ टेंटों की हल्की-हल्की लाइटें, दूर तक फैली पहाड़ियों की ख़ामोशी,
और आसमान में टिमटिमाते तारे।

वो पलभर के लिए ठिठक गई।
उसे याद आया, जब एक दिन डॉ. बख़्श उसके कमरे में बिना इजाज़त दाख़िल हुए थे —
और उसने झुंझलाकर उनके हाथ पर ज़ोर से काट लिया था।

“यार, बहुत तेज़ काटती हो तुम!”
बख़्श हँस पड़े थे।

वो याद आते ही क़ंदील के चेहरे पर हल्की मुस्कान तैर गई।
उस वक़्त भी मौसम कुछ यूँ ही बेईमान और खूबसूरत था —
और बख़्श की आमद ने उसे और भी यादगार बना दिया था।

क़ंदील ने पीछे मुड़कर देखा —
थोड़ी दूरी पर बख़्श का टेंट भी था,
और उसकी लाइट अब भी जल रही थी।
“वो भी जाग रहे हैं…” उसने सोचा।

उसी वक़्त पीछे से किसी ने पुकारा —

“क़ंदील…”

वो पलटी — डॉ. समीर खड़े थे।

“जी, डॉक्टर समीर? आपने कहा था, कुछ ज़रूरी बात करनी है?”
क़ंदील हमेशा की तरह सीधे मुद्दे पर आ गई।

“हाँ, डॉक्टर क़ंदील… बात बहुत ज़रूरी है।
कई दिन से सोच रहा था कि बता दूँ।”

वो दोनों धीरे-धीरे चलने लगे।
ठंडी हवा, खामोश रात, और दूर बजती किसी टेंट की हल्की-सी म्यूज़िक —
माहौल कुछ अजीब-सा सुकूनभरा था।

डॉ. समीर ने एक नज़र क़ंदील पर डाली —
वो शॉल में लिपटी हुई थी, उसके चेहरे पर चांदनी पड़ रही थी।
उनके दिल में कुछ अनकहा-सा हिलने लगा।

“ऐसी क्या ज़रूरी बात थी, डॉक्टर समीर,
जो आधी रात को ही बतानी थी?”
क़ंदील ने मुस्कुराकर कहा।

“मेरे दिल ने सोचा...
इस खूबसूरत मौसम में अगर ये बात कह दूँ,
तो शायद सच्ची लग जाएगी।”

क़ंदील हल्की-सी हँस पड़ी।
“मैं समझी नहीं, आप क्या कहना चाह रहे हैं?”

“क़ंदील… जब से मैंने आपको देखा है,
उस दिन से मेरे दिल में आपके लिए एक अजीब-सी कैफ़ियत है।
मैंने सोचा था वक़्ती एहसास है,
पर वक्त के साथ ये एहसास और गहरा होता गया…”

क़ंदील ने उसे गौर से देखा —
आज उसकी आँखों में कुछ अलग था।

“डॉ. समीर, आप जानते हैं ना —
मुझे बातों को घुमा-फिरा कर कहना पसंद नहीं है।
जो कहना है, सीधा कहिए।”

समीर ने गहरी साँस ली।

“डॉ. क़ंदील… I like you.
और ये ‘like’ अब सिर्फ़ पसंद नहीं रहा…
मैं आपसे मोहब्बत करता हूँ।”

क़ंदील की आँखें फैल गईं।
उसने यक़ीन नहीं किया कि समीर ने वाक़ई ये कहा है।

हवा ठंडी थी,
पर उसके कानों में अभी भी वही तीन शब्द गूंज रहे थे —
“मोहब्बत करता हूँ…”

वो कुछ पल तक बस उसे देखती रह गई —
बेख़याली में, ख़ामोश, और हैरान।


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