Kandil Part 11

 



देर बाद दरवाजे के बीच ओ बीच वकील साहब खड़े थे।

और उनके ठीक सामने नवाब साहब  थे।

उनके ठीक बराबर में उनकी बेगम साहिबा बैठी हुई थी। जो वकील साहब के बोलने का इंतजार कर रही

थी।

कमरे में अजीब तरह की खामोशी छा गई थी। क्योंकि जब तक नवाब साहब बोलने के लिए बात शुरू नहीं करते थे किसी की मजाल नहीं थी। 

कि कोई कुछ बोलना?

शुरू करे।

जी वकील साहब फरमाइए क्या सॉल्यूशन निकला है इस प्रॉब्लम का?

नवाब साहब ने कड़क मगर धीमे लहजे में वकील साहब से कहा था।

नवाब साहब सब कुछ तैयार है सब कुछ हो जाएगा।

किसी भी तरीके की कोई दिक्कत नहीं है मैंने सारे पेपर्स तैयार करवा लिए हैं।

वकील  साहब ने कहा।

यह तो बहुत अच्छी खबर सुनाई अपने वकील साहब।

नवाब साहब मुस्कुराते हुए बोले। 

नवाब साहब के चेहरे पर बहुत कम हंसी नजर आती थी।

मगर एक दिक्कत है नवाब साहब। 

वकील साहब ने कहा।

कैसी दिक्कत वकील साहब।

नवाब साहब के चेहरे पर फिर से सख्क्ति आ गई थी।

जब तक सैफ के साइन नहीं होंगे तो कुछ भी नहीं हो सकता है।

यह बहुत बड़ी बात थी जो वकील साहब ने बहुत आसानी से बोल दी थी।

और ,और हम जानते हैं कि वह बदबख्त कभी इन पपेरो पर साइन नहीं करेगा।

नवाब साहब बहुत ही गुस्से में अपनी कुर्सी से उठाते हुए बोले। 

उनका गुस्सा देखकर वकील डर गए था। 

नवाब साहब उसके साइन लेना इतना मुश्किल काम नहीं है। 

आप गुस्सा मत कीजिए। वकील ने नवाब साहाब को  समझाने की कोशिश की।

वकील साहब में उस शख्स को बहुत अच्छी तरह से जानता हूं। 

यह जितना आसान आप समझ रहे हैं हरगिज  आसान नहीं है।

नवाब साहब फिर से अपनी छड़ी को लेकर कमरे के उधर-उधर टहलने लगे थे।

नवाब साहब इस  बात से मैं भी वाकिफ हूं ।

कि वह सैफ हरगिज इन पपेरो पर जानकर साइन नहीं करेगा मैं जानता हूं इस बात को। 

मगर नवाब साहब हमें किसी भी तरह से धोखे से उसके इन पेपर्स पर साइन करवाना पड़ेंगे। 

वकील साहब ने अपना मशवरा नवाब साहब को समझाते हुए कहा।

धोखे से मगर धोखे से कैसे ।

हम सैफ से इन पेपर्स पर साइन करवा सकते हैं?

और कौन यह पेपर सैफ के पास लेकर जाएगा साइन करवाने के लिए? 

नवाब साहब को इस बात की फिक्र सताने लगी।

माफ कीजिएगा नवाब साहब इस चीज के लिए हमें।

वकील साहब कुछ बोलते बोलते खामोश हो गए थे।

आप खामोश क्यों हो गए वकील साहब बताइए इस चीज के लिए हमें क्या करना पड़ेगा।

हम कुछ भी कर सकते हैं वकील साहब। 

वकील साहब इन पेपर्स को साइन करने के लिए हमें। वकील साहब कुछ पल के लिए फिर खामोश हो गए थे। 

हमें कंदील को सैफ के सामने लाना पड़ेगा।

उन्होंने डरते डरते यह बात कही थी ।

क्योंकि वह जानते थे इस बात को सुनकर नवाब साहब का पारा और हाई हो गया?

बस वकील साहब बस खामोश हो जाइए आप। 

नवाब साहब की गुस्से भरी आवाज पूरे कमरे में। गूंजने लगी थी।

वकील साहब उनके गुस्से भरी आवाज सुनकर दो कदम उनसे पीछे हो गए थे। 

आप यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि हम हरगिज। कंदील को सैफ के सामने नहीं आने देंगे। 

उस बदजात की नजर भी अपनी बच्ची पर हम नहीं पढ़ने देंगे। 

फिर आपने कैसी नाफरमानी वाली बात अपने मुंह से निकाल दी वकील साहब। 

आपको अपनी जान की बिल्कुल भी परवाह नहीं है। 

नवाब साहब का गुस्सा थमने में नहीं आ रहा था

मगर नवाब साहब हमें ऐसा करना पड़ेगा।

हमें पेपर्स को लेकर कन्दील को सैफ के सामने भेजना पड़ेगा।

इसके अलावा हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है।


वकील साहब हर मुमकिन कोशिश कर रहे थे ।

कि नवाब साहब समझ जाए जो वह कहना चाह रहे थे। 

लेकिन शायद नवाब साहब ने भी कसम खा ली थी ।

कि वह हरगिज वकील साहब की बात समझने के लिए तैयार ही नहीं होन्गे ।

वकील साहब ये आपकी जिम्मेदारी आप कोई दूसरा रास्ता ढूंढिऐ ।

हम हरगिज कंदील को सैफ के सामने नहीं ला सकते हैं ।

आप समझ रहे हैं ना हमारी बात को।

नवाब साहब गुस्से के आलम में कमरे में इधर-उधर टहल रहे थे। 

और यह शायद दोनों भूल चुके थे की बेगम साहिबा इस कमरे में मौजूद है।

ऐसा लग रहा था उनका होना नहीं होना बराबर ही है।

कभी वह वकील साहब को देखती ।

कभी वह नवाब साहब को देखती और खामोशी ईख्तियार कर लेती थी।

इन दोनों की बहस में  वह कुछ नहीं बोल सकती थी ।

बस खामोशी से दोनों को देख सकती थी।

  वो खामोश होकर अपने काम को अंजाम देख दे रही थी।

ओके नवाब साहब मैं कोशिश करता हूं कि कोई दूसरा रास्ता ढूंडो। 

लेकिन आप इस बात को अच्छी तरह समझ लीजिए।

अगर कोई दूसरा रास्ता नहीं मिला तो फिर  मजबूरन हम लोगों को यही रास्ता ईख्तियार करना पड़ेगा।

  वो नवाब साहब को वार्निंग भरे  लहजे  में समझा रहे थे।

और आप अच्छी तरह से जानते हैं वकील साहब की इस बात पर मैं हरगिज राजी नहीं होऊँगा। 

नवाब साहब ने भी अपना आखिरी फैसला सुनाते हुए कहा। 

देखते हैं फिर हमें क्या करना है? 

वकील साहब ने कहा और अपने पेपर्स समेटे हुए। दरवाजे की तरफ जाने के लिए मुड  गए।

नवाब साहब खामोशी से उनको जाता हुआ देखने लगे।

नवाब साहाब को अपने खानदानी वकील पर बहुत भरोसा था

वो जानते थे ।

वकील साहब जल्दी ही इस परेशानी का तोड़ निकाल देन्गे

फिर भी जाने क्यो दिल मे नवाब साहाब के अजीब अजीब ख्याल आ रहे थे।

जिस से नवाब साहाब की बेचैनी बड़ रही थी।

नवाब साहाब कंदील को  सैफ के सामने किसी भी कीमत पर नही लाना चाह रहे थे।

नवाब साहाब सैफ से बेईन्तेहा नफरत करते थे।

क्योकी सैफ ने उनकी कन्दील को बहुत हर्ट किया था।

उस कन्दील को जिसे नवाब साहाब हद से ज्यादा चाहते थे।


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