Rahe Bismill: रमना वकार की अनजान आवाज़ का जादू | Umar Jamal & Ramna Wakar | Hindi Suspense Novel
पिछले हिस्से में आपने पढ़ा कि किस तरह वो अनजान शख्स शबे नूर को खामोश करवाने के लिए स्लीप टैबलेट का इस्तेमाल करता है और पूरी बात समझाता है। दूसरी तरफ इख्तियार साहब, दादी अम्मी और उमर जमाल शबे नूर के लिए बहुत परेशान होते हैं। उसका कुछ पता नहीं चल रहा है।
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अभी वह शख़्स शबे नूर को समझा ही रहा था कि अचानक उसके फोन की घंटी बज उठी।
उसने घबराकर जेब से फोन निकाला। जैसे ही उसकी नज़र स्क्रीन पर पड़ी, उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
स्क्रीन पर लिखा था— Papa Calling…
“ओह माय गॉड…”
एक पल के लिए उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। शबे नूर उसकी हालत को बहुत ग़ौर से देख रही थी। उसके चेहरे पर आने वाला हर तास्सुर जैसे उसकी नज़रों से छिप नहीं पा रहा था।
वह शबे नूर से थोड़ा फ़ासला बनाकर खड़ा हो गया और जल्दी से कॉल रिसीव की।
“हेलो, पापा…” हरिस ने धीमी आवाज़ में कहा।
दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई—
“हेलो हरिस! कहाँ हो तुम? और ये तुम्हारा फोन क्यों नहीं उठ रहा था? कब से ट्राई कर रहा हूँ।”
ये शहनवाज़ अंसारी थे।
उनके लहज़े से साफ़ महसूस हो रहा था कि वह अपने बेटे हरिस के लिए कितने परेशान और बेचैन थे।
“वो पापा… मेरा फोन साइलेंट पर था, इसलिए मुझे पता नहीं चला। और आप मेरी बिल्कुल फ़िक्र मत कीजिए। मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”
हरिस ने उन्हें मुतमइन करने की कोशिश की।
लेकिन शहनवाज़ अंसारी शायद उसकी बातों से मुतमइन नहीं हुए।
“हरिस, मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा है। क्योंकि न तुम अपने किसी बॉडीगार्ड को साथ लेकर गए हो और ऊपर से ड्राइवर से भी झूठ कहा है। आखिर बात क्या है?”
उनकी आवाज़ में बेटे के लिए फ़िक्र साफ़ झलक रही थी।
“पापा, आप समझते क्यों नहीं? मैं कोई बच्चा नहीं हूँ कि आप इतनी सिक्योरिटी के साथ मुझे हर जगह भेजें।”
हारिस की आवाज़ अचानक तेज़ हो गई थी।
“मुझे नहीं रहना इतनी बंदिशों में! मैं वापस यहीं से चला जाऊँगा।”
गुस्से में हारिस ये भी भूल गया कि वह इस वक्त कहाँ खड़ा है।
उसकी तेज़ आवाज़ सुनकर अस्पताल की नर्स कमरे के अंदर आ गई।
“मैम, प्लीज़ अपने हसबैंड से कहिए थोड़ा आहिस्ता बात करें। ये हॉस्पिटल है, पब्लिक प्लेस है।”
नर्स ने शबे नूर से कहा।
शबे नूर ने पहले नर्स की तरफ़ देखा और फिर हारिस की तरफ़।
नर्स अपनी बात कहकर वापस चली गई।
लेकिन हारिस अभी भी फोन पर ही बिज़ी था।
शबे नूर धीरे से बेड से उठी और उसके पास जाकर उसका हाथ पकड़कर हिलाने लगी।
हारिस ने हैरानी से उसकी तरफ़ देखा और फोन को अपने कान से थोड़ा दूर किया।
“वो नर्स बोलकर गई हैं कि आहिस्ता बात कीजिए। ये हॉस्पिटल है।”
शबे नूर ने अपनी बड़ी-बड़ी पलकों को झपकाते हुए कहा।
हारिस का ज़हन अचानक फोन से हटकर पूरी तरह शबे नूर पर टिक गया।
उसकी मासूमियत भरी आँखें, झपकती हुई पलकें और चेहरे पर साफ़ दिखाई देती नाराज़गी… हारिस को एक पल के लिए जैसे सब कुछ भूलने पर मजबूर कर गई।
दूसरी तरफ़ से शहनवाज़ अंसारी की आवाज़ अभी भी आ रही थी—
“हेलो… हेलो हारिस? क्या हुआ तुम्हें?”
लेकिन हारिस जैसे कुछ सुन ही नहीं रहा था।
“मैं आपसे ही बात कर रही हूँ… आप हिप्नोटाइज़ क्यों हो गए हैं?”
शबे नूर ने उसका हाथ थोड़ा ज़ोर से हिलाते हुए कहा।
तब जाकर हारिस अपने ख़यालों से बाहर आया।
उसने सबसे पहले फोन काट दिया।
“आप क्या कह रही थीं मुझसे?” हारिस ने हैरानी से पूछा।
शबे नूर ने उसे घूरकर देखा।
“अरे, आप बिल्कुल पागल हैं क्या? अभी नर्स डाँटकर गई है कि हॉस्पिटल है, आहिस्ता बात कीजिए। आपको इतनी-सी बात समझाने में कितना वक्त लग गया!”
शबे नूर का इस वक्त अपना माथा पीट लेने का मन कर रहा था।
जो शख़्स कुछ देर पहले तक उसे समझाने में लगा हुआ था, वही अब खुद ऐसी बेवकूफ़ी भरी हरकत कर रहा था।
हारिस को अपनी गलती का एहसास हुआ तो उसने शर्मिंदा होकर कहा—
“ओह… सॉरी। मैंने सुना नहीं था।”
शबे नूर ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें थोड़ी सिकोड़ते हुए उसे देखा।
“सुनते भी तो कैसे? आप तो किसी और को सुनने में बिज़ी थे।”
हारिस उसकी बात सुनकर चुप हो गया।
लेकिन उसकी नज़रें अब भी शबे नूर के चेहरे पर टिकी थीं।
वह जैसे उसकी हर हरकत को बहुत ग़ौर से नोट कर रहा था।
और शबे नूर को बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उसकी यही छोटी-छोटी हरकतें हरिस के ज़हन में एक अजीब-सी हलचल पैदा कर रही थीं…
Dosri taraf,,,,,
काफ़ी देर से बज रहे फोन को आखिरकार उमर जमाल ने रिसीव किया।
“हेलो…”
दूसरी तरफ़ से एक अनजान लड़की की आवाज़ सुनाई दी।
“सर, आप जो फाइल देकर गए थे, आज मेरे ऑफिस में… उसमें एक डाउट क्लियर नहीं हो रहा है।”
उमर जमाल कुछ पल के लिए ख़ामोश रहा।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर ये लड़की कौन है।
“सॉरी… आप कौन बोल रही हैं?” उमर ने पूछा।
लड़की ने हल्की-सी हँसी के साथ कहा—
“अरे सर, आप इख़्तियार सर ही बोल रहे हैं ना? कल आप ऑफिस आए थे बिज़नेस प्रपोज़ल लेकर।
मैं रमना वकार बोल रही हूँ।”
उसने अपना तआरुफ़ कराया।
“जी… कहिए।”
उमर के लिए रमना वकार बिल्कुल अनजान नाम था।
वह इस लड़की से पहले कभी नहीं मिला था, फिर भी न जाने क्यों उसकी आवाज़ सुनकर उसके ज़हन में एक अजीब-सी दिलचस्पी पैदा होने लगी।
रमना ने बात जारी रखी—
“जी सर, तो मैं ये कह रही थी कि उस बिज़नेस फाइल में एक पॉइंट पर डाउट क्लियर नहीं हो रहा है। तो प्लीज़ आप कल आ जाइएगा। अपने बेटे को भी साथ ले आइएगा।
प्रोजेक्ट पर साइन भी हो जाएँगे और बाकी बातें भी वहीं कर लेंगे।”
“ओके…” उमर ने नोर्मल-सा जवाब दिया।
“फिर कल मिलकर बात करते हैं।
अल्लाह हाफ़िज़।”
“जी … अल्लाह हाफ़िज़।”
रमना ने इतना कहकर फोन काट दिया।
लेकिन उमर जमाल का फोन अभी भी उसके कान से लगा हुआ था।
जैसे उसे यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि कॉल ख़त्म हो चुकी है।
कुछ पल तक वह उसी तरह ख़ामोश खड़ा रहा।
फिर उसके होंठों से एकदम ही उस लड़की का नाम निकला—
“रमना वकार…”
वह दोबारा बुदबुदाया—
“रमना वकार…”
न जाने क्यों उस अनजान लड़की की आवाज़ उमर जमाल के ज़हन में अटक गई थी।
वह तो उसे जानता तक नहीं था, फिर उसकी आवाज़ में ऐसा क्या था जो उमर को अपनी तरफ़ खींच रहा था?
उस अनजान लड़की की बातों में उमर को जैसे कोई अजीब-सा जादू नज़र आ रहा था…
और शायद यही उस मुलाक़ात की शुरुआत थी, जिसका असर आने वाले दिनों में उमर जमाल की पूरी ज़िंदगी बदलने वाला था।
🔮 कहानी में आगे क्या हो सकता है?
अगले दिन इख़्तियार अपने बेटे के साथ ऑफिस पहुँच सकता है।
पहली मुलाक़ात में रमना और उमर के बीच एक अजीब-सी कशिश महसूस हो सकती है।
बिज़नेस फाइल का वह डाउट शायद कहानी में कोई नया राज़ खोल दे।
दूसरी तरफ़ शबे नूर की गुमशुदगी और हरिस की ज़िंदगी का रहस्य भी सामने आता जाएगा।
सबसे बड़ा सवाल यह रहेगा कि क्या रमना वकार और उमर जमाल का रिश्ता सिर्फ़ एक बिज़नेस मुलाक़ात तक रहेगा, या उनकी ज़िंदगी में कोई नया मोड़ आने वाला है?
🌱 इस हिस्से से सीख
कभी-कभी ज़िंदगी में कुछ मुलाक़ातें बिल्कुल अचानक होती हैं, लेकिन उनका असर हमारी सोच से कहीं ज़्यादा गहरा हो सकता है। इसलिए हर नए रिश्ते और हर अनजान इंसान को समझने के लिए जल्दबाज़ी के बजाय वक़्त देना चाहिए।
📖 अगला छोटा हिस्सा
Writing
अगली सुबह इख्तियार साहब अपने बेटे को साथ लेकर ऑफिस पहुँच गए।
रमना वकार पहले से ही वहाँ मौजूद थी।
जैसे ही उसकी नज़र उमर पर पड़ी, उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
“गुड मॉर्निंग, सर।”
“गुड मॉर्निंग…”
उमर ने जवाब तो दिया, लेकिन उसकी नज़रें एक पल के लिए रमना के चेहरे पर ठहर गईं।
कल फोन पर सुनी गई आवाज़ और आज सामने खड़ी रमना वकार…
उमर के ज़हन में एक ही ख़याल आया—
आख़िर इस लड़की की आवाज़ में ऐसा क्या था, जो कल रात से अब तक मेरे ज़हन से निकल ही नहीं रही?
लेकिन उसे क्या पता था कि यह मुलाक़ात सिर्फ़ एक बिज़नेस मीटिंग नहीं थी…
बल्कि उसकी ज़िंदगी में आने वाले एक नए तूफ़ान की शुरुआत थी।
💌 Readers के लिए शुक्रिया SMS
Message
मेरी प्यारी रीडर्स ❤️
“राहे बिस्मिल्ल” को अपना प्यार और वक़्त देने के लिए दिल से शुक्रिया।
आपकी मोहब्बत और इंतज़ार ही मुझे इस कहानी को आगे लिखने की हिम्मत देता है। ❤️
उमर जमाल, रमना वकार, शबे नूर और हरिस की ज़िंदगी अब किस मोड़ पर जाएगी, ये जानने के लिए कहानी से जुड़े रहिए।
“राहे बिस्मिल्ल” का अगला हिस्सा 12/09/2026 तक पब्लिश्ड हो जाएगा।
अपना प्यार यूँ ही बनाए रखिए। ❤️
— Afsana Wahid



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