Rahe bismill Part 11: क़ब्रिस्तान में हमला, रहस्यमयी अजनबी और मौत से सामना | Emotional Thriller Hindi Nove

 


एक पल और रुक जाती, तो शायद बिखर जाती।

मुझे नहीं पता उस शख़्स ने मेरे आँसू क्यों देखे, या उसके दिल में क्या बदला— पर मुझे इतना पता था कि आज किसी अजनबी के सामने मैं अपनी सारी मज़बूती खो चुकी थी।

और कभी-कभी… सबसे गहरी मुलाक़ातें टकराने से ही शुरू होती हैं।


रमना अपने ऑफिस के केबिन में, ख़ामोशी के बीच बैठी फ़ाइल पढ़ रही थी। नज़रें काग़ज़ों पर थीं, लेकिन दिल किसी अनजानी आहट को पहले ही महसूस कर चुका था।

तभी इंटरकॉम बजा।

“मैम, इख़्तियार साहब आपका वेट कर रहे हैं। रिसेप्शन पर।”

रमना ने फ़ाइल बंद की। हल्के से अपने सिर पर हाथ फेरा— मानो खुद को संभालने की कोशिश कर रही हो।

“ओह… वो आ गए हैं।”

उसने धीरे से खुद से कहा।

“ओके, आप उन्हें मेरे केबिन में भेज दीजिए।”

कॉल कट गई।

रमना अपनी कुर्सी पर बैठी आने वाले शख़्स के बारे में सोचने लगी। वह पहली बार इख़्तियार साहब से मिलने वाली थी।

दिल में एक अजीब-सी हलचल थी। वह उनसे मिलने को लेकर एक्साइटेड भी थी, लेकिन उतनी ही कन्फ्यूज़ भी।

आख़िर वे कैसे होंगे? उनकी शख़्सियत वैसी ही होगी जैसी लोगों ने बताई थी, या उनसे बिल्कुल अलग?

इन अनगिनत सवालों के बीच उसकी धड़कनें जाने क्यों थोड़ी-थोड़ी तेज़ होने लगी थीं।


और रमना का ध्यान फ़ाइल से हटकर

अब सामने वाले दरवाज़े पर टिक गया।


कुछ मिनटों बाद

दरवाज़े पर दस्तक हुई।


“Yes, come in, sir.”


वह अपनी कुर्सी पर बैठी-बैठी बोली।


अंदर आने वाला शख़्स

उसके पिता की उम्र का था—

रौबीला, सलीकेदार,

और ऐसी पर्सनैलिटी का मालिक,

जो बिना बोले भी अपनी मौजूदगी का एहसास करा दे।


रमना तुरंत अपनी कुर्सी से खड़ी हुई

और उन्हें बैठने का इशारा करते हुए बोली,


“Sit down, sir.”


उसके चेहरे पर एक शालीन मुस्कान थी।


वह शख़्स भी मुस्कुराते हुए बैठ गया,

और रमना भी अपनी कुर्सी पर बैठ गई।


“Sir, मुझे बहुत अच्छा लगा कि आप

मेरे कहने पर ख़ुद मुझसे मिलने आए।

आपका बहुत-बहुत शुक्रिया

कि आपने पापा की बात मानी।”


उसकी आवाज़ में आदर था,

लेकिन आत्मविश्वास भी।


इख़्तियार साहब ने बिना किसी घुमाव के कहा—


“Miss Ramna Waqar,

बिज़नेस में मेरा एक ही उसूल है—

पहले प्रॉफिट,

बाद में कोई रिश्ता।”


उनकी साफ़गोई में कोई तल्ख़ी नहीं थी,

बस सच्चाई थी।


“और जहाँ तक तुम्हारे वालिद का सवाल है—

हम जवानी से एक-दूसरे को जानते हैं।

मुझे तुम्हारे साथ काम करना था,

इसलिए मैं ख़ुद यहाँ आया हूँ।”


“ओह… ग्रेट, सर।”


रमना ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा।


“मैं चाहता तो अपने बेटे को भी भेज सकता था,”


वह आगे बोले,


“लेकिन मुझे इस प्रोजेक्ट में

ख़ुद बहुत दिलचस्पी लगी,

इसलिए ख़ुद आना बेहतर समझा।


और मैंने इस प्रोजेक्ट की पूरी फ़ाइल पढ़ी है।

मुझे खुशी होगी

तुम्हारे साथ काम करने में।”


“Same to you, sir.”


रमना की मुस्कान इस बार

पहले से थोड़ी और गहरी थी।


“तो फिर ठीक है,”


वह मीटिंग को मुद्दे पर लाते हुए बोली,


“कल मैं पापा को यहाँ बुला लेती हूँ,

और आप अपने बेटे को।


कल रात बिज़नेस के ज़रूरी पेपर्स पर

साइन कर लेते हैं।”


“कल मैं पापा को यहाँ बुला लेती हूँ, और आप अपने बेटे को। कल रात बिज़नेस के ज़रूरी पेपर्स पर साइन कर लेते हैं।”

“जैसा आपको ठीक लगे, Miss Ramna Waqar।”

वह मुस्कुराए।

“जी, बेहतर।”

रमना ने सिर हिलाया।

इख़्तियार साहब ने घड़ी पर नज़र डाली और उठ खड़े हुए।

“मुझे एक ज़रूरी मीटिंग में जाना है। कल मिलते हैं।”

“जी, सर।”

रमना भी अपनी कुर्सी से खड़ी हो गई।

वह जाते-जाते रमना पर एक गहरी नज़र डाल गए— जैसे उसके भीतर छिपी काबिलियत को परख रहे हों।

फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ वह केबिन से बाहर निकल गए।

और रमना...

दरवाज़े को बंद होते हुए देखती रह गई, यह जाने बिना कि यह मीटिंग सिर्फ़ एक बिज़नेस डील की शुरुआत नहीं थी, बल्कि उसकी ज़िंदगी के एक नए मोड़ का आग़ाज़ भी बनने वाली थी।


“क्यों आप दोनों मुझे इस दुनिया में अकेला छोड़कर चले गए…


काश मैं भी आपके साथ ही चली जाती,

और इस बेसहारा दुनिया से बेख़बर रहती।


जब भी मैं तन्हा होती हूँ, माँ,

मैं आपको और पापा को खुदा से माँगती हूँ।


माँ… आप क्यों चली गईं?


पापा… आपने भी मुझे यूँ अकेला छोड़ दिया…”


शबे नूर अपने माता-पिता की क़ब्र के पास बैठी फूट-फूटकर रो रही थी।


रोते-रोते जब उसकी साँसें उखड़ने लगीं,

तो उसने अपनी साँसों पर क़ाबू पाने की कोशिश की।


पिछले एक घंटे से

वह अपने वालिदैन की क़ब्र के पास बैठी रो रही थी,

और वहाँ उसके आँसू पोंछने वाला भी

कोई नहीं था।


“क्यों आप दोनों मुझे इस दुनिया में अकेला छोड़कर चले गए…


काश मैं भी आपके साथ ही चली जाती,

यूँ इस बेसहारा दुनिया से ग़ाफ़िल रहती।


जब भी तन्हा होती हूँ,

मैं आपको खुदा से तलाश करती हूँ।


मम्मा… आप क्यों चली गईं?


पापा…”


उसकी भर्राई हुई आवाज़

क़ब्रिस्तान की ख़ामोशी में गुम होती जा रही थी।


“मैम, काफ़ी वक़्त हो गया है।

चलिए यहाँ से।


बड़ी मैडम ने कहा था कि

एक घंटे से ज़्यादा आप यहाँ नहीं रुक सकतीं।


और वैसे भी…

ये क़ब्रिस्तान है।”


उसका ड्राइवर पीछे से आवाज़ लगाकर कह रहा था।


“तुम जाओ…

मैं आती हूँ।”


उसने अपने आँसू साफ़ करते हुए

अपने ड्राइवर से कहा।


शबे नूर धीरे-धीरे उठी

और ड्राइवर के पीछे चलने लगी।


ड्राइवर गाड़ी में बैठ चुका था।


इस वक़्त शबे नूर ने

सफ़ेद रंग की ख़ूबसूरत अनारकली फ़्रॉक के साथ पायजामा पहन रखा था।


उसके सिर पर सफ़ेद दुपट्टा था,

और उसी दुपट्टे से झाँकते उसके लंबे,

रेशमी, खुले बाल

उसकी मासूम ख़ूबसूरती में चार चाँद लगा रहे थे।


शबे नूर जैसे ही गाड़ी में बैठने वाली थी,

अचानक किसी ने उसका हाथ पकड़कर

उसे अपनी तरफ़ खींचते हुए नीचे झुका दिया।


उसी पल

तड़… तड़… तड़…


गोलियों की आवाज़ें गूँज उठीं।


“चलो… गाड़ी में बैठो!”


उस अजनबी शख़्स ने फ़ौरन कहा।


और शबे नूर…


हक्का-बक्का-सी

उस अजनबी को देख रही थी।


उसका पूरा जिस्म

थर-थर काँप रहा था।





आगे क्या हो सकता है?

अजनबी शख़्स शबे नूर को गोलियों से बचाकर वहाँ से निकाल लेगा।

रास्ते में पता चलेगा कि हमला असल में उसी अजनबी पर हुआ था, लेकिन शबे नूर बीच में आ गई।

शबे नूर घायल हो जाएगी और अजनबी उसे अस्पताल पहुँचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल देगा।

दूसरी तरफ़ हमलावर अपने बॉस को बताएँगे कि उनका निशाना बच गया है, जिससे कहानी में एक बड़े दुश्मन की एंट्री होगी।

यहीं से शबे नूर और उस रहस्यमयी शख़्स की तक़दीरें एक-दूसरे से जुड़ने लगेंगी।

इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?

माता-पिता की कमी इंसान की ज़िंदगी का सबसे गहरा दर्द होती है।

मुश्किल वक़्त में हिम्मत और सब्र इंसान की सबसे बड़ी ताक़त होते हैं।

कभी-कभी एक अजनबी भी फ़रिश्ते की तरह हमारी ज़िंदगी में आता है।

ज़िंदगी कब और कैसे बदल जाए, इसका अंदाज़ा किसी को नहीं होता।

Next Short Part

Writing

शबे नूर अभी तक सदमे से बाहर नहीं निकल पाई थी।

उसके कानों में गोलियों की आवाज़ें गूँज रही थीं, जबकि वह अजनबी उसे अपनी ढाल बनाए आगे बढ़ रहा था।

अचानक उसने पीछे मुड़कर देखा।

दूर अँधेरे में कुछ साये उनकी तरफ़ बढ़ रहे थे।

उस अजनबी की आँखों में पहली बार बेचैनी साफ़ दिखाई दी।

उसने शबे नूर का हाथ और मज़बूती से थाम लिया और धीमी आवाज़ में कहा,

“अब जो भी हो… मेरा हाथ मत छोड़ना।”

शबे नूर कुछ समझ नहीं पा रही थी, लेकिन उसके दिल को पहली बार एहसास हुआ कि उसकी ज़िंदगी अब पहले जैसी नहीं रहने वाली।

Readers ke liye Shukriya SMS

Writing

प्रिय पाठकों,

दिल की गहराइयों से आपका शुक्रिया कि आपने "शबे नूर" को अपना कीमती वक़्त और इतना प्यार दिया। आपकी हर रीड, हर कमेंट और हर दुआ मेरे लिए नई हिम्मत बनती है। उम्मीद है कि कहानी का यह मोड़ आपको पसंद आया होगा।

इस कहानी का अगला हिस्सा 5/8/2026 को रात 11:30 बजे प्रकाशित होगा।

तब तक अपना ख़याल रखिए और अपनी दुआओं में याद रखिए।




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