Rahe bismill, Part 12: गोलियों की बारिश, अस्पताल की जंग और एक अनजानी मोहब्बत | Emotional Thriller Hindi Novel




 पिछले भाग में आपने पढ़ा...


रमना पहली बार इख़्तियार साहब से मुलाक़ात करती है। बिज़नेस से जुड़ी बातचीत के दौरान इख़्तियार साहब, रमना की समझदारी, आत्मविश्वास और काम करने के अंदाज़ से काफ़ी प्रभावित होते हैं और उसके साथ काम करने के लिए अपनी रज़ामंदी दे देते हैं।


वहीं दूसरी तरफ़, शबे नूर अपने वालिदैन की क़ब्र पर बैठकर घंटों अपने दर्द को आँसुओं में बहाती रहती है। वापस लौटते वक़्त, जैसे ही वह अपनी गाड़ी में बैठने वाली होती है, अचानक एक अजनबी शख़्स उसे अपनी तरफ़ खींचकर अपनी गाड़ी में बैठने का हुक्म देता है। शबे नूर कुछ समझ पाती या उससे कोई सवाल करती, उससे पहले ही चारों तरफ़ गोलियों की तड़तड़ाहट गूँज उठती है। उस अजनबी की जान पर हमला हो चुका था, और अनजाने में शबे नूर भी उस ख़ूनी खेल का हिस्सा बन जाती है।


अब आगे...





शबे नूर को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।


आख़िर कौन था वह शख़्स?

और ये गोलियाँ आखिर किसके लिए तबाड़-तोड़ चलाई जा रही थीं?


हर तरफ़ अफ़रा-तफ़री मची हुई थी।


वह अजनबी शख़्स शबे नूर के इतने क़रीब था,

जितना आज तक कोई भी नहीं आया था।


उसका सिर बार-बार उसके लंबे, चौड़े सीने से टकरा रहा था,

जबकि वह अपनी मज़बूत बाँहों में उसे इस तरह संभाले हुए था,

मानो किसी भी क़ीमत पर उसे कोई नुकसान नहीं पहुँचने देगा।


शबे की दोनों कलाइयाँ उसने कसकर थाम रखी थीं,

ताकि गोलियों की बौछार के बीच वह घबराकर इधर-उधर न भाग जाए।


“ड्राइवर... गाड़ी चलाओ...

Start the car!”


उस शख़्स की रौबदार आवाज़ पूरी कार में गूँज उठी।


मगर सामने से कोई जवाब नहीं आया।


एक पल के लिए उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।


उसने सिर उठाकर ड्राइवर की तरफ़ देखा।


ड्राइवर की गर्दन एक तरफ़ लुढ़की हुई थी।

उसके सीने से लगातार ख़ून बह रहा था।


गोली सीधे उसके सीने में लगी थी।


वह दम तोड़ चुका था।


“ओह... शिट...”


बेइख़्तियार उसके होंठों से निकला।


उसी पल शबे नूर की भीनी-सी ख़ुशबू उसके नथुनों में उतर गई।


बेहद नाज़ुक,

मासूम और पाकीज़ा।


एक लम्हे के लिए उसकी नज़र शबे नूर के चेहरे पर ठहर गई।


वह किसी बार्बी डॉल की तरह मासूम और बेहद ख़ूबसूरत लग रही थी।


मगर अगले ही पल उसने खुद को झटक दिया।


यह वक़्त उसकी ख़ूबसूरती देखने का नहीं,

बल्कि उसे ज़िंदा बचाकर यहाँ से निकालने का था।


फिर भी न जाने क्यों,

उसकी इतनी क़रीबी उस अजनबी के दिल में एक अजीब-सी बेचैनी पैदा कर रही थी।


यह सब एक हादसा था...


लेकिन शायद वही हादसा

उसकी ज़िंदगी की दिशा बदलने वाला था।


शबे नूर का पूरा जिस्म डर से काँप रहा था।


उसके होंठ सूख चुके थे,

चेहरा बिल्कुल सफ़ेद पड़ गया था,

और उसकी साँसें बुरी तरह बिखर रही थीं।


“ए... हेलो... तुम ठीक हो ना?”


उसने बड़ी नर्मी से उसके गाल को थपथपाते हुए कहा।


मगर शबे नूर की आँखें धीरे-धीरे बोझिल होने लगीं।


अचानक उसकी पलकों ने साथ छोड़ दिया,

और वह पूरी तरह बेहोश होकर

उस अजनबी की बाँहों में ढह गई।


“ए... उठो... उठो...”


उसकी आवाज़ में पहली बार घबराहट साफ़ सुनाई दे रही थी।


उसने उसे हल्के-हल्के झकझोरते हुए फिर पुकारा,


“सुनो... आँखें खोलो...

प्लीज़... अभी बेहोश मत होना...”



वह उसे होश में लाने की कोशिश कर रहा था,

मगर उसकी आँखें नहीं खुल रही थीं।


शायद वह सदमे और डर की वजह से बेहोश हो चुकी थी।


उस अजनबी शख़्स ने बेहद एहतियात से उसे अपनी बाँहों में उठाया

और गाड़ी की पिछली सीट पर आराम से लिटा दिया,

ताकि सफ़र के दौरान उसे ज़्यादा तकलीफ़ न हो।


फिर वह तेज़ी से आगे की सीट की तरफ़ बढ़ा।


ड्राइवर को हटाना आसान नहीं था।


बड़ी मुश्किल से उसने उसके बेजान जिस्म को दूसरी सीट की तरफ़ खिसकाया।


ड्राइवर के सीने में गोली लगी हुई थी।


उसकी धड़कनें हमेशा के लिए थम चुकी थीं।


एक पल के लिए उसने आँखें बंद कीं,

मगर अगले ही पल खुद को संभाल लिया।


यह रुकने का वक़्त नहीं था।


उसने बिना एक लम्हा गँवाए गाड़ी स्टार्ट की।


जैसे ही कार आगे बढ़ी,

पीछे से फिर गोलियों की बौछार शुरू हो गई।


तड़... तड़... तड़...


उसने फ़ौरन अपना सिर नीचे झुका लिया।


कुछ गोलियाँ गाड़ी के शीशों और बॉडी से टकराईं,

लेकिन उसने रफ़्तार कम नहीं की।


पूरी ताक़त से एक्सीलेटर दबाते हुए

वह उस ख़ौफ़नाक जगह की हदों से बाहर निकल गया।


काफ़ी दूर आने के बाद जाकर उसने राहत की एक लंबी साँस ली।


फिर भी उसका दिल

बेक़ाबू होकर सीने से टकरा रहा था।


इस वक़्त उसे अपनी जान से ज़्यादा

उस अजनबी लड़की की फ़िक्र थी,

जिसे वह जानता तक नहीं था।


मगर न जाने क्यों,

उसे खो देने का ख़याल

उसके दिल को अंदर तक हिला रहा था।


आज चली हर गोली

असल में उसी के लिए थी।


लेकिन वह लड़की...


बिना कुछ समझे,

उसके और मौत के बीच आकर खड़ी हो गई थी।


उसने काँपते हाथों से गाड़ी सड़क के किनारे रोकी।


दरवाज़ा खोलते ही

वह जल्दी से पिछली सीट की तरफ़ पहुँचा।


“उठो...

प्लीज़ उठो...”


इस बार उसकी आवाज़ में रौब नहीं,

सिर्फ़ बेबसी थी।


वह उसके क़रीब झुका,

धीरे से उसका नाम पूछने की कोशिश की,

मगर उसे तो उसका नाम तक नहीं मालूम था।


उसने उसके कंधे को हल्के से हिलाया,

मगर कोई जवाब नहीं मिला।


वह यूँ  पड़ी थी,

जैसे सारी दुनिया की थकान

एक ही पल में उसकी रूह पर उतर आई हो।


उसकी साँसें बहुत धीमी थीं,

और हर गुज़रते लम्हे के साथ

उस अजनबी की बेचैनी बढ़ती जा रही थी।



जिस गाड़ी में वह उसे यहाँ तक लाया था,

वह उसी की थी।


और आगे वाली सीट पर बैठा उसका ड्राइवर—

अब सिर्फ़ एक ख़ामोश लाश बन चुका था।


उसकी नज़र एक बार फिर उस लड़की पर जा ठहरी।


उसके सफ़ेद लिबास पर फैला हुआ ख़ून

दिल को चीर देने वाला मंज़र पेश कर रहा था।


उसके बाज़ू में धँसी गोली

जैसे सीधे उसके अपने जिस्म में उतर गई हो।


वह धीरे-धीरे उसके क़रीब आया—


बहुत क़रीब।


इतना क़रीब कि

उसके ज़ख़्मों से बहता ख़ून

उसके अपने कपड़ों में भी रच-बस गया।


लेकिन उस पल

उसे अपने कपड़ों पर लगे ख़ून की परवाह नहीं थी।


डर था तो बस इतना,

कि कहीं वह लड़की उसकी आँखों के सामने

हमेशा के लिए ख़ामोश न हो जाए।


उसने काँपते हाथों से

उसके बाज़ू को थामा

और उसकी धड़कन टटोलने लगा।


धड़कन बहुत धीमी थी…


मगर अभी भी चल रही थी।


उसने राहत की एक गहरी साँस ली

और लगभग फुसफुसाते हुए बोला—


“तुम्हें कुछ नहीं होगा…


मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा…”


वह वहीं उसके पास बैठा रहा।


अपने ज़ख़्म की परवाह किए बग़ैर,

अपने दर्द को भुलाए हुए,

बस यही सोचता रहा

कि अब उसे कैसे बचाए।


क्योंकि आगे वाली सीट पर

मौत ख़ामोश बैठी थी,


और पीछे उसकी बाँहों में

ज़िंदगी अपनी आख़िरी साँसों से लड़ रही थी।


वह उसके और क़रीब बैठ गया।


गाड़ी की हेडलाइट्स

अँधेरे को चीरती हुई

उसके चेहरे पर पड़ रही थीं।


उस हल्की पीली रौशनी में

वह लड़की यूँ बेहोश पड़ी थी,

मानो किसी ने उसकी पूरी दुनिया

एक ही पल में उससे छीन ली हो।


उसके हाथ बुरी तरह काँप रहे थे।


उसने अपनी घायल बाज़ू की ओर

एक बार भी नहीं देखा।


उसकी सारी फ़िक्र

सिर्फ़ उस मासूम लड़की के लिए थी।


उसने बहुत एहतियात से

उसका चेहरा अपनी दोनों हथेलियों में थाम लिया।


“प्लीज़…”


उसकी आवाज़ भर्रा गई।


“ऐसे मत सोओ…


मैं तुम्हें जानता भी नहीं हूँ…


फिर भी…


फिर भी तुम्हें इस हालत में नहीं देख सकता।”


उसकी आँखें नम हो चुकी थीं।


शायद बरसों बाद

किसी अजनबी के दर्द ने

उसके अपने दिल को भी दर्द का एहसास कराया था।



अस्पताल से थोड़ी दूर पर उस शख़्स ने अपनी गाड़ी रोकी,

अब वह उसे अपनी बाँहों में उठाए तेज़ क़दमों से अस्पताल की ओर बढ़ चुका था।

अस्पताल ज़्यादा दूर नहीं था,

लेकिन गाड़ी में ड्राइवर की लाश होने की वजह से वह कार को अस्पताल के बिल्कुल सामने रोकने की हिम्मत नहीं कर सका।

उसकी साँसें उखड़ रही थीं।

घायल होने की वजह से उसके क़दम भी लड़खड़ा रहे थे,

मगर उसने रुकना मंज़ूर नहीं किया।

उसकी बाँहों में पड़ी उस मासूम जान को बचाना इस वक़्त उसकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी बन चुका था।

“डॉक्टर…!

डॉक्टर…!

Come here…!

Please… संभालिए इसे!”

अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में दाख़िल होते ही वह लगभग चीख़ पड़ा।

उसके बाज़ू से लगातार ख़ून टपक रहा था,

और उसकी बाँहों में वह नाज़ुक-सा वजूद था,

जिसके सफ़ेद कपड़े भी अब ख़ून से लाल हो चुके थे।

“Emergency!”

नर्स की तेज़ आवाज़ पूरे कॉरिडोर में गूँज उठी।

“Please… रास्ता दीजिए!”

कुछ ही पलों में स्ट्रेचर उसकी तरफ़ बढ़ाया गया।

उसने बहुत एहतियात से उसे अपनी बाँहों से स्ट्रेचर पर लिटा दिया।

जैसे ही वह उससे दूर हुई,

उसने एक गहरी साँस ली

और बेइख़्तियार आसमान की तरफ़ देखकर अल्लाह का शुक्र अदा किया।

आज न जाने क्यों

उस अजनबी लड़की की जान बचाना

उसे अपनी जान से भी ज़्यादा ज़रूरी लग रहा था।

उसका बार्बी डॉल जैसा मासूम,

ख़ूबसूरत,

खिला हुआ चेहरा

बार-बार उसकी आँखों के सामने आ रहा था।

वह जितना उसे भूलने की कोशिश करता,

उतना ही उसका चेहरा उसके दिल में उतरता चला जाता।

तभी अचानक उसकी नज़र अपने हाथ पर पड़ी।

उसकी मुट्ठी में एक सफ़ेद दुपट्टा कसकर थामा हुआ था।

वह उसी लड़की का दुपट्टा था।

शायद घबराहट में वह उसे छोड़ ही नहीं पाया था।

उसने अनजाने में उसे इतनी मज़बूती से पकड़ रखा था,

मानो वह कोई कपड़ा नहीं,

बल्कि उस लड़की की साँसें हों—

जिन्हें छोड़ देने की हिम्मत अब उसमें बिल्कुल भी नहीं बची थी।




दूसरी तरफ उमर जमाल,,


“क्या हुआ?”

कॉल रिसीव करते ही दादी अम्मी की घबराई हुई आवाज़ सुनाई दी।

वह बार-बार शबे नूर  का हाल पूछ रही थीं,

क्योंकि उसे गए कई घंटे बीत चुके थे।

न उसका कोई पता था,

न उसका फ़ोन लग रहा था।

ड्राइवर का  भी फोन नही लग रहा था,

और उमर भी बार-बार कॉल करके थक चुका था।

“न… नहीं, दादी…” वह कुछ कहने ही वाला था…

मगर दादी अम्मी को देखकर खामोश हो गया। 



आगे क्या हो सकता है?

डॉक्टर बताएँगे कि शबे नूर की हालत नाज़ुक है और तुरंत ऑपरेशन करना होगा।

रहस्यमयी शख़्स पहली बार अपना नाम बताएगा, लेकिन अपनी असली पहचान सबसे छिपाए रखेगा।

ज़िहान और दादी अम्मी अस्पताल पहुँचेंगे, जहाँ उस अजनबी से उनकी पहली मुलाक़ात होगी।

पुलिस ड्राइवर की मौत और हमले की जाँच शुरू करेगी, जिससे एक बड़े दुश्मन और गहरी साज़िश का खुलासा होने लगेगा।

शबे नूर के होश में आने से पहले ही उस अजनबी के दिल में उसके लिए अनकहे जज़्बात जन्म लेने लगेंगे।




इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?

ज़िंदगी एक पल में बदल सकती है, इसलिए हर पल की क़द्र करनी चाहिए।

इंसानियत और किसी की जान बचाने से बढ़कर कोई बहादुरी नहीं होती।

मुश्किल हालात में भी हिम्मत और सब्र इंसान की सबसे बड़ी ताक़त होते हैं।

कभी-कभी अजनबी लोग हमारी ज़िंदगी का सबसे अहम हिस्सा बन जाते हैं।




Next Short Part

Writing

ऑपरेशन थिएटर की लाल बत्ती लगातार जल रही थी।

बाहर खड़ा वह शख़्स बेचैनी से बार-बार दरवाज़े की तरफ़ देख रहा था।

उसके हाथ अब भी ख़ून से सने हुए थे, लेकिन उसे अपने ज़ख़्म का एहसास तक नहीं था।

तभी ऑपरेशन थिएटर का दरवाज़ा खुला।

डॉक्टर बाहर आए।

उनके चेहरे के बदलते भाव देखकर उसका दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया।

“डॉक्टर... कैसी है वो?”

उसने काँपती आवाज़ में पूछा।

डॉक्टर ने गहरी साँस ली...

और जो कहा, उसे सुनकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

Readers ke liye Shukriya SMS

Writing

प्रिय पाठकों,

अस्सलामु अलैकुम!

दिल की गहराइयों से आपका शुक्रिया कि आपने "शबे नूर" के हर हिस्से को इतना प्यार दिया। आपकी हर रीड, हर कमेंट और हर दुआ मेरे लिए नई हिम्मत और नई प्रेरणा बनती है। उम्मीद है कि कहानी का यह भावनात्मक और रहस्यमयी मोड़ आपको पसंद आया होगा।

अपना प्यार और दुआएँ इसी तरह बनाए रखिए, क्योंकि असली सफ़र अभी बाकी है।

📖 इस कहानी का अगला हिस्सा 8/8/2026 को रात 11:30 बजे प्रकाशित होगा।

शुक्रिया! ❤️



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