Rahe Bismill Part: Shabe Noor का फ़ोन क़ब्रिस्तान में मिला | Umar के सामने आया नया राज़
पिछले हिस्से में आपने पढ़ा...
Shabe Noor अपने वालिदैन की क़ब्र पर पहुँचकर कई घंटों तक रोती रहती है। दिल का सारा बोझ आँसुओं के रास्ते बाहर निकालने के बाद जब वह क़ब्रिस्तान से बाहर आती है, तो अचानक कोई शख़्स उसका हाथ पकड़कर उसे अपनी गाड़ी में बैठा लेता है।
Shabe Noor घबरा जाती है।
वह कुछ समझ पाती, इससे पहले ही बाहर से ताबड़तोड़ गोलियों की आवाज़ें गूँज उठती हैं।
गोली चलने की आवाज़ सुनते ही Shabe Noor के होश उड़ जाते हैं और वह बेहोश होकर गाड़ी में गिर जाती है।
उसे बेहोश देखकर वह शख़्स भी परेशान हो जाता है।
आख़िर कौन था वह शख़्स?
और Shabe Noor को क़ब्रिस्तान से अपने साथ क्यों ले गया था?
बिना वक़्त गँवाए वह गाड़ी को तेज़ रफ़्तार से अस्पताल की तरफ़ बढ़ा देता है...
अब पढ़िए आगे...
“कुछ पता नहीं चल रहा है कि वो कहाँ है...”
Umar ने बेचैनी से कहा।
उसके चेहरे पर साफ़ परेशानी दिखाई दे रही थी।
“मैंने आपको कितनी बार समझाया था कि उसे अकेले कहीं मत भेजा कीजिए... फिर भी आपने वही बचकानी हरकत दोहरा दी।”
उसकी आवाज़ में झुंझलाहट थी...
लेकिन उस झुंझलाहट के पीछे छिपा डर उससे भी ज़्यादा गहरा था।
Umar को Shabe Noor की बहुत फ़िक्र हो रही थी।
भले ही वह उससे निकाह नहीं करना चाहता था...
भले ही उसने हमेशा उससे एक फ़ासला बनाए रखा था...
लेकिन इस वक़्त Shabe Noor का यूँ अचानक लापता होना उसे अंदर तक बेचैन कर रहा था।
आख़िरकार...
वह उसकी ज़िम्मेदारी थी।
और Umar अपनी ज़िम्मेदारी से कभी पीछे नहीं हटता था।
उसने बेचैनी में अपनी उँगलियाँ बालों में फिराईं।
“आख़िर वो गई कहाँ...?”
उसके दिल में बार-बार एक ही सवाल उठ रहा था।
तभी अचानक उसके फ़ोन की घंटी बज उठी।
ट्रिन... ट्रिन...
Umar ने फ़ौरन फ़ोन की तरफ़ देखा।
नंबर अनजान था।
न जाने क्यों उस नंबर को देखते ही उसके दिल में एक अजीब-सा ख़तरा उतर आया।
उसने बिना देर किए कॉल रिसीव कर ली।
“हैलो...?”
उसकी आवाज़ में हल्की घबराहट साफ़ महसूस हो रही थी।
दूसरी तरफ़ से किसी ने कुछ कहा।
Umar की आँखें अचानक सिकुड़ गईं।
“हाँ... जी, बोल रहा हूँ।”
कुछ पल सुनने के बाद उसने पूछा,
“हाँ... जी... हमारी ही गाड़ी है।”
दूसरी तरफ़ से मिली बात सुनते ही Umar के चेहरे का रंग बदल गया।
“क्या...?”
उसकी आवाज़ अचानक भारी हो गई।
“कब... और कैसे?”
कुछ पल तक वह ख़ामोश होकर सामने वाले की बात सुनता रहा।
उसके चेहरे पर अब चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी।
फिर उसने धीमी आवाज़ में कहा,
“ओह... ठीक है।”
एक पल रुककर उसने कहा—
“हम अभी पहुँचते हैं वहाँ।”
कॉल कट गई।
Umar कुछ सेकंड तक मोबाइल को हाथ में लिए बिल्कुल ख़ामोश खड़ा रहा।
फिर अचानक उसने अपनी मर्सिडीज़ की चाबी उठाई।
“पापा... जल्दी चलिए।”
उसकी आवाज़ में ऐसी जल्दबाज़ी थी कि उसके पापा भी बिना कोई सवाल किए उठ खड़े हुए।
“क्या हुआ, Umar?”
लेकिन Umar ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह तेज़ी से दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गया।
उसके चेहरे पर अब सिर्फ़ एक ही सवाल था—
Shabe Noor कहाँ है...?
और फ़ोन पर जो ख़बर उसे मिली थी...
उसके बाद उसके दिल में उठ रहा डर पहले से कहीं ज़्यादा गहरा हो चुका था।
पीछे से दादी अम्मी की घबराई हुई आवाज़ आई—
“Umar... कहाँ जा रहे हो बेटा?
क्या हुआ है?
किसकी कॉल थी?”
एक साथ इतने सवाल...
मगर Umar के दिल में इस वक़्त सिर्फ़ एक ही नाम गूँज रहा था—
Shabe Noor।
Umar को पुलिस की कॉल आई थी।
और उस कॉल पर मिली ख़बर ने जैसे उसके पैरों तले से ज़मीन खींच ली थी।
उसकी गाड़ी सड़क के किनारे लावारिस हालत में मिली थी...
और गाड़ी का ड्राइवर...
मर चुका था।
Umar का दिल एक पल के लिए जैसे थम गया।
“नहीं...”
उसके होंठों से बेइख़्तियार निकला।
उसने फ़ौरन अपने पापा की तरफ़ देखा।
“पापा... हमें अभी वहाँ पहुँचना होगा।”
वह बिना एक पल गँवाए उनके साथ निकल पड़ा।
---
जब Umar उस जगह पहुँचा तो पुलिस पहले ही वहाँ मौजूद थी।
सड़क के किनारे उसकी गाड़ी खड़ी थी।
दरवाज़ा खुला हुआ था और आसपास का माहौल अजीब-सी ख़ामोशी में डूबा हुआ था।
मगर सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात यह थी कि—
Shabe Noor गाड़ी में नहीं थी।
ड्राइवर की मौत हो चुकी थी...
गाड़ी वहाँ मौजूद थी...
लेकिन Shabe Noor...
ग़ायब थी।
पुलिस उसे हर तरफ़ तलाश कर रही थी।
और Umar का दिल हर गुज़रते लम्हे के साथ और ज़्यादा डूबता जा रहा था।
उसके ज़ेहन में बार-बार एक ही ख़याल आ रहा था—
“आख़िर Shabe Noor कहाँ चली गई...?”
---
कुछ देर बाद Umar थाने में बैठा था।
उसके दोनों हाथ उसके सिर पर थे और निगाहें ज़मीन पर टिकी हुई थीं।
वह बाहर से ख़ामोश था...
मगर उसके अंदर जैसे तूफ़ान बरपा था।
सामने बैठे पुलिस अफ़सर ने फ़ाइल बंद की और सख़्त लहजे में पूछा—
“मतलब आपकी कज़िन, Shabe Noor, पिछले चार घंटे से लापता थी?”
Umar ने धीरे से सिर उठाया।
“जी... हाँ, सर।”
“और आपकी कॉल भी रिसीव नहीं कर रही थी?”
“जी...”
Umar की आवाज़ भारी थी।
अफ़सर ने उसकी तरफ़ कुछ देर गौर से देखा।
फिर सवाल किया—
“तो आपने ये पता लगाने की कोशिश नहीं की कि इतने वक़्त से वो कहाँ है?”
ये सवाल Umar के सीने में तीर की तरह लगा।
उसने बेचैनी से अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं।
“मैंने... मैंने कोशिश की थी।”
उसकी आवाज़ में दर्द उतर आया।
“लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि मामला इतना संगीन हो जाएगा।”
अफ़सर ने गंभीर नज़रों से उसे देखा।
“मिस्टर Umar... ये महज़ गुमशुदगी का मामला नहीं लग रहा।”
Umar की धड़कन एकदम तेज़ हो गई।
“क्या मतलब...?”
अफ़सर ने फ़ाइल दोबारा खोली।
“जिस हालत में आपकी गाड़ी मिली है... और ड्राइवर के साथ जो हुआ है... उससे हमें शक है कि Shabe Noor को महज़ रास्ते से नहीं उठाया गया।”
Umar के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं।
“तो फिर...?”
अफ़सर ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“हमें शक है कि उसे किसी ने जान-बूझकर निशाना बनाया है।”
Umar की आँखों में अचानक एक अजीब-सी चमक उभरी।
उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा।
और उसी पल उसके ज़ेहन में सिर्फ़ एक बात आई—
“अगर Shabe Noor को किसी ने नुकसान पहुँचाया है... तो मैं उसे छोड़ूँगा नहीं।”
ऑफ़िसर के सवाल अब तीर बनकर Umar के सीने में उतर रहे थे।
उसके अंदर ग़ुस्सा उबल रहा था, मगर हालात ने उसे ख़ामोश रहने पर मजबूर कर दिया था।
उसने गहरी साँस ली और धीमी आवाज़ में कहा—
“सर... वो कहकर गई थी कि आधे घंटे में वापस आ जाएगी।”
ये कहते हुए Umar की नज़रें ख़ुद-ब-ख़ुद झुक गईं।
उसे अपना ही जवाब अच्छा नहीं लग रहा था।
क्योंकि हर लफ़्ज़ के साथ उसके दिल में यह एहसास और गहरा होता जा रहा था कि शायद...
कहीं न कहीं...
उससे ही कोई बहुत बड़ी भूल हो गई थी।
अगर उसने उसे रोका होता...
अगर वह उसके साथ चला गया होता...
अगर उसने उसकी बात को थोड़ा और गंभीरता से लिया होता...
तो शायद आज Shabe Noor यूँ ग़ायब न होती।
थाने की ख़ामोशी में Umar का डर जैसे साँस लेने लगा था।
उसकी आँखों के सामने बार-बार Shabe Noor का चेहरा घूम रहा था।
अगर उसे कुछ हो गया तो...?
इस ख़याल ने ही उसकी रूह तक हिला दी।
वह ख़ुद को ज़िंदगी भर माफ़ नहीं कर पाएगा।
तभी अचानक थाने के अंदर मौजूद एक पुलिसकर्मी तेज़ क़दमों से उनकी तरफ़ आया।
“सर...”
ऑफ़िसर ने उसकी तरफ़ देखा।
“क्या हुआ?”
पुलिसकर्मी ने अपनी जेब से एक मोबाइल फ़ोन निकाला और कहा—
“एक मोबाइल क़ब्रिस्तान के पास मिला है।”
उसने वह फ़ोन आगे बढ़ाकर ऑफ़िसर के हाथ में दे दिया।
Umar की निगाह जैसे ही उस मोबाइल पर पड़ी...
उसका दिल एक पल के लिए रुक-सा गया।
वह कुर्सी से लगभग उठते हुए बोला—
“ये...!”
उसकी आवाज़ काँप गई।
इख़्तियार साहब ने भी मोबाइल को गौर से देखा।
फिर उन्होंने फ़ौरन ऑफ़िसर की तरफ़ देखते हुए कहा—
“ये तो Shabe Noor का ही फ़ोन है।”
Umar की आँखें मोबाइल पर जम गईं।
उसका चेहरा अचानक फ़क़ पड़ गया।
“क़ब्रिस्तान के पास...?”
उसने बमुश्किल पूछा।
ऑफ़िसर ने गंभीरता से सिर हिलाया।
“जी।”
Umar के सीने में जैसे किसी ने पत्थर रख दिया हो।
अगर Shabe Noor का फ़ोन वहाँ मिला था...
तो फिर वह ख़ुद कहाँ थी?
उसने बेचैनी से फ़ोन की तरफ़ हाथ बढ़ाया, लेकिन ऑफ़िसर ने उसे रोक दिया।
“अभी इसे हाथ मत लगाइए।”
Umar ने परेशान होकर पूछा—
“लेकिन सर... अगर ये उसका फ़ोन है, तो इसमें शायद कोई ऐसी चीज़ हो जो हमें उसके बारे में बता सके।”
ऑफ़िसर ने मोबाइल को देखते हुए कहा—
“इसीलिए इसे जाँच के लिए भेजा जाएगा।”
Umar की बेचैनी और बढ़ गई।
उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।
उसके दिल में बस एक ही दुआ थी—
“या अल्लाह... Shabe Noor को महफ़ूज़ रखना।”
लेकिन उसे क्या मालूम था...
कि जिस जगह से Shabe Noor का मोबाइल मिला था...
वहीं से उसकी ज़िंदगी के सबसे बड़े राज़ का एक दरवाज़ा खुलने वाला था।
🔮 इस कहानी में आगे क्या हो सकता है?
पुलिस Shabe Noor के मोबाइल की जाँच करेगी और उसमें से आख़िरी कॉल या कोई संदिग्ध मैसेज सामने आ सकता है।
क़ब्रिस्तान के आसपास लगे CCTV या किसी गवाह से कोई अहम सुराग मिल सकता है।
Umar को शक हो सकता है कि Shabe Noor को पहले से कोई निशाना बना रहा था।
मोबाइल में मौजूद कोई तस्वीर या रिकॉर्डिंग ऐसा राज़ खोल सकती है, जिसका ताल्लुक़ Umar के अतीत से हो।
सबसे बड़ा twist यह हो सकता है कि Shabe Noor को नुकसान पहुँचाने वाला कोई बाहर का दुश्मन नहीं, बल्कि घर के बहुत क़रीब का कोई शख़्स हो।
🌙 इस हिस्से से हमें क्या सीख मिलती है?
कभी-कभी हम किसी इंसान की अहमियत तब समझते हैं, जब वह हमारी आँखों के सामने नहीं होता। रिश्तों में अपनी ज़िम्मेदारी और अपनों की फ़िक्र को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए। साथ ही, मुश्किल हालात में घबराने के बजाय सब्र और समझदारी से काम लेना ज़रूरी है।
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Writing
ऑफ़िसर ने Shabe Noor का मोबाइल अपने हाथ में लिया और उसे ध्यान से देखने लगा।
“सब लोग ध्यान से सुनिए...”
उसकी आवाज़ गंभीर थी।
“हमें इस फ़ोन से जो भी जानकारी मिलेगी, वो इस केस के लिए बेहद अहम हो सकती है।”
Umar बेचैनी से स्क्रीन की तरफ़ देख रहा था।
अचानक ऑफ़िसर की उँगली स्क्रीन पर रुक गई।
“एक मिनट...”
उन्होंने भौंहें सिकोड़ लीं।
“इस फ़ोन से आख़िरी कॉल...”
Umar फ़ौरन आगे बढ़ा।
“किसे की गई थी, सर?”
ऑफ़िसर ने स्क्रीन पर नंबर देखा...
और अगले ही पल उनके चेहरे के भाव बदल गए।
“ये नंबर...”
उन्होंने धीरे से कहा।
Umar का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा।
“क्या हुआ, सर?”
ऑफ़िसर ने उसकी तरफ़ देखा और कहा—
“Umar... ये नंबर तुम्हारे लिए अनजान नहीं होना चाहिए।”
Umar के चेहरे का रंग उड़ गया।
आख़िर वो नंबर किसका था?
और Shabe Noor ने ग़ायब होने से ठीक पहले उसे फ़ोन क्यों किया था?
जानने के लिए पढ़ते रहिए Rahe Bismill...
💌 Readers के लिए शुक्रिया
Writing
मेरे प्यारे पाठकों,
Rahe Bismill को अपना कीमती वक़्त देने और हर नए हिस्से के साथ मेरा हौसला बढ़ाने के लिए आप सभी का दिल की गहराइयों से शुक्रिया। ❤️
आपका हर कमेंट, हर रिएक्शन और हर प्यार मेरे लिए बहुत मायने रखता है।
उम्मीद है आप इसी तरह इस कहानी के सफ़र में मेरे साथ बने रहेंगे और Shabe Noor तथा Umar की ज़िंदगी में आने वाले नए राज़ों और मोड़ों को पढ़ते रहेंगे।
इंशा अल्लाह, इस कहानी का अगला हिस्सा 11/08/2026 को रात 11 बजकर 30 मिनट पर ब्लॉग पर प्रकाशित होगा।
तब तक अपना ख़याल रखिए और अपनी दुआओं में याद रखिए। ❤️
— Afsana Wahid
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Har article ko likhne mein waqt, mehnat aur dil lagta hai. Agar aap meri mehnat ko support karna chahte hain, to neeche diye gaye QR code ko scan karke apna yogdan de sakte hain.
Aapka har support mujhe aur behtar content likhne ki himmat deta hai.
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