राहे बिस्मिल्ल | क्या उमर जमाल अपनी मोहब्बत भूल पाएगा? | अतीत का दर्द और दिल की तड़प | Part 5

 




रामना ने प्यार से उस नन्ही बच्ची का हाथ थामा और उसे तसल्ली देने के अंदाज़ में हल्की-सी मुस्कुराई।


"चलो... मैं तुम्हें सड़क के उस पार छोड़ देती हूँ।"


बच्ची ने मासूमियत से सिर हिला दिया।


रामना बहुत एहतियात से उसका छोटा-सा हाथ थामे, एक-एक क़दम बढ़ाती हुई सड़क पार कराने लगी। उसकी नज़रें हर तरफ थीं, ताकि दोबारा कोई गाड़ी उनकी तरफ़ न आ जाए।


हवा हल्की-हल्की चल रही थी, मगर रामना के सीने में उठता तूफ़ान अभी भी थमा नहीं था। कुछ ही लम्हे पहले अगर उसके हाथ वक़्त पर ब्रेक तक न पहुँचते, तो न जाने कितना बड़ा हादसा हो जाता।


सड़क के दूसरी तरफ पहुँचकर उसने बच्ची के सिर पर प्यार से हाथ फेरा।


"आइंदा कभी भी ऐसे अकेले सड़क पार मत करना... पहले दोनों तरफ अच्छी तरह देखना, फिर जाना। समझीं?"


बच्ची ने मासूम-सी मुस्कान के साथ "जी" में सिर हिलाया और दौड़कर अपने बाबा की तरफ चली गई।


रामना उसके जाते हुए क़दमों को देखती रही। उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान थी, मगर दिल अभी भी उसी हादसे के ख़याल से काँप रहा था।


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मगर रामना वक़ार इस बात से बिल्कुल बेख़बर थी कि कुछ ही फ़ासले पर खड़ा एक शख़्स शुरू से उसे ग़ौर से देख रहा था।


वो कोई और नहीं, उमर जमाल था।


यह पहली बार था जब उसकी नज़र रामना वक़ार पर पड़ी थी। उसने रामना का चेहरा भी ठीक से नहीं देखा था, मगर जो मंज़र उसकी आँखों के सामने आया था, उसने उसके अंदर अजीब-सा ग़ुस्सा भर दिया।


उसके ज़ेहन में बार-बार वही लम्हा घूम रहा था—


अगर उस लड़की ने एक पल भी देर से ब्रेक लगाया होता...


अगर गाड़ी ज़रा-सी भी आगे बढ़ जाती...


तो आज उस मासूम बच्ची की साँसें हमेशा के लिए थम चुकी होतीं।


उमर जमाल अभी भी अपनी गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर बैठा था।


उसकी उँगलियाँ स्टीयरिंग पर कस चुकी थीं और निगाहें सड़क के उस पार खड़ी उसी आठ साल की बच्ची पर जमी हुई थीं।


उसका चेहरा सख़्त हो चुका था।


अचानक उसकी नज़र दूर से आती एक और तेज़ रफ़्तार गाड़ी पर पड़ी।


वो गाड़ी सीधी उसी बच्ची की तरफ़ बढ़ रही थी।


रफ़्तार इतनी तेज़ थी कि अगर एक लम्हे की भी देर हो जाती, तो इस बार बचने की कोई उम्मीद नहीं थी।


उमर जमाल का दिल ज़ोर से धड़क उठा।


"ला हौल वला क़ुव्वत..."


उसके होंठों से बेसाख़्ता निकला।


बिना एक पल गंवाए उसने झटके से अपनी गाड़ी का दरवाज़ा खोला और पूरी रफ़्तार से उस बच्ची की तरफ़ दौड़ पड़ा।



"ला हौल वला क़ुव्वत..."


उसके होंठों से बेसाख़्ता निकला।


बिना एक लम्हा गंवाए उसने झटके से अपनी गाड़ी का दरवाज़ा खोला।


अगर वह एक मिनट... नहीं... सिर्फ़ एक सेकंड भी देर कर देता, तो शायद आज उसकी आँखों के सामने एक मासूम ज़िंदगी हमेशा के लिए बुझ जाती।


वह लगभग दौड़ता हुआ उस बच्ची की तरफ़ बढ़ा।


उसके क़दमों की रफ़्तार बढ़ चुकी थी, साँसें तेज़ी से चल रही थीं और दिल इस तरह धड़क रहा था मानो सीने से बाहर निकल आएगा।


उसकी निगाहें सिर्फ़ उस मासूम बच्ची पर टिकी थीं।


मगर तभी...


सड़क पर एक तेज़ चीख़ती हुई आवाज़ गूँजी।


"चीईईईं..."


तेज़ रफ़्तार गाड़ी ने ऐन वक़्त पर ब्रेक लगा दिए।


उमर जमाल के क़दम वहीं ठिठक गए।


उसकी धड़कनें अभी भी बेक़ाबू थीं।


गाड़ी का दरवाज़ा खुला...


और उसमें से एक लड़की घबराई हुई हालत में बाहर निकली।


वह बिना किसी की परवाह किए दौड़ती हुई बच्ची तक पहुँची और सड़क के बीचों-बीच घुटनों के बल बैठ गई।


अगले ही पल उसने उस मासूम को अपनी बाँहों में इस तरह समेट लिया, जैसे बरसों से बिछड़ी कोई अपनी चीज़ वापस मिल गई हो।


उसके हाथ हल्के-हल्के काँप रहे थे।


वह बार-बार बच्ची के चेहरे को दोनों हथेलियों में लेकर देख रही थी कि कहीं उसे चोट तो नहीं लगी।


उमर जमाल वहीं सड़क के किनारे खड़ा रह गया।


उसके क़दम जैसे ज़मीन में धँस चुके थे।


उसकी नज़र पहली बार उस लड़की पर ठहरी।


पिंक रंग का लॉन्ग टॉप...


गले में उसी रंग का हल्का-सा स्कार्फ...


ब्लू जीन्स...


और चेहरे पर घबराहट के बावजूद एक अजीब-सी पाकीज़गी।


उसने एक गहरी साँस ली और अपने दोनों हाथ सीने पर बाँध लिए।


उसके अंदर का ग़ुस्सा अभी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ था।


वह अब भी यही समझ रहा था कि इस लड़की की लापरवाही की वजह से एक मासूम जान ख़तरे में पड़ गई थी।


उसके ज़ेहन में बस एक ही ख़याल घूम रहा था—


"जाकर इस बेवकूफ़ लड़की को अच्छी तरह सुनाता हूँ... इतनी तेज़ रफ़्तार से गाड़ी चलाने की आख़िर क्या ज़रूरत थी?"


वह आगे बढ़ने ही वाला था...


मगर अगले ही लम्हे उसकी नज़र उस लड़की की हरकतों पर पड़ी और उसके क़दम वहीं रुक गए।


वह बच्ची के आँसू अपने दुपट्टे से पोंछ रही थी।


कभी उसके बाल सहलाती...


कभी उसके माथे को चूमती...


कभी उसे अपने सीने से लगा लेती...


उसकी आवाज़ काँप रही थी, मगर लहजा इतना नरम था कि सुनने वाले का दिल भी पिघल जाए।


"कुछ नहीं हुआ बेटा... मैं हूँ न... अब डरने की कोई बात नहीं..."


उमर जमाल चुपचाप उसे देखता रह गया।


उसकी आँखों का ग़ुस्सा धीरे-धीरे हैरत में बदलने लगा।


एक सेकंड...


दो सेकंड...


तीन सेकंड...


ऐसा लगा मानो वक़्त ने उसी लम्हे ख़ुद को रोक लिया हो।


चारों तरफ़ चलती दुनिया अपनी रफ़्तार में थी...


मगर उमर जमाल के लिए सब कुछ थम चुका था।


बस हवा की सरसराहट उसके कानों से टकरा रही थी।


उस लड़की की मोहब्बत भरी नरमी...


उसकी फ़िक्र...


उसका एक अजनबी बच्ची के लिए इस तरह तड़प जाना...


उमर जमाल को पत्थर की तरह वहीं जड़ कर गया।


वह ग़ुस्सा जो कुछ लम्हे पहले उसके दिल में भड़क रहा था...


अब बर्फ़ की तरह पिघल चुका था।


उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे पहली बार किसी ने उसके दिल की धड़कनों को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लिया हो।


वह बस उसे देखता रह गया...


बिना पलकें झपकाए...


बिना कुछ सोचे...


उसे एक पल के लिए लगा...


क्या यह सच है... या मैं कोई ख़ूबसूरत ख़्वाब देख रहा हूँ?


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"उमर जमाल... तुम उस लड़की को भूल क्यों नहीं जाते?"


दादी जान की आवाज़ उसके कानों से टकराई तो वह अचानक अपनी यादों की दुनिया से बाहर आ गया।


दादी जान की आवाज़ में ग़ुस्सा कम और दर्द ज़्यादा था।


"उसे तुम्हारी रत्ती भर भी फ़िक्र नहीं... फिर क्यों उसके इर्द-गिर्द अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर रहे हो?


यूँ उसके पीछे चलते-चलते एक दिन तुम ख़ुद ही टूट जाओगे...


मगर वह पत्थर-दिल लड़की शायद कभी न पिघले।


आख़िर तुम ये बात क्यों नहीं समझते?


तुम ख़ुद को इतनी सख़्त सज़ा क्यों दे रहे हो?"


उमर जमाल अपने कमरे में खिड़की के पास बैठा था।


बाहर बाग़ में रंग-बिरंगे फूल खिले हुए थे।


ठंडी हवा परदों को हौले-हौले हिला रही थी।


मगर उसके कमरे के अंदर वीरानी का ऐसा आलम था, जैसे बरसों से वहाँ किसी ने मुस्कुराया ही न हो।


उसके कंधों पर पड़ी हल्की-सी चादर उसकी तन्हाई का बोझ अपने अंदर समेटे हुए थी।


उसने खिड़की से बाहर देखते हुए बेहद फीकी-सी मुस्कान दी।


"दादी जान..."


उसने धीमे मगर टूटे हुए लहजे में कहा।


"क्या आपने कभी सोचा है...


अगर किसी इंसान के सीने से उसका दिल निकाल लिया जाए...


तो क्या वह ज़िंदा रह सकता है?"


दादी जान की आँखें भर आईं।


"बेटा... बिना दिल के भी कोई जीता है क्या?"


उमर जमाल ने उनकी तरफ़ देखा।


उसकी आँखें आँसुओं से भीगी हुई थीं।


लब काँप रहे थे।


"वो सिर्फ़ एक लड़की नहीं है, दादी जान...


वो मेरे सीने में धड़कता हुआ दिल है।


जिस दिन वो मुझसे दूर हुई...


उसी दिन मेरी ज़िंदगी की सारी रौनक भी मुझसे दूर चली गई।"


उसकी आवाज़ भर्रा गई।


दादी जान का सब्र भी जवाब दे गया।


उन्होंने आगे बढ़कर उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा।


मगर कुछ कह न सकीं।


उनकी आँखों से आँसू बह निकले।


वह चुपचाप पलटीं और कमरे से बाहर चली गईं।


कमरे में फिर वही ख़ामोशी उतर आई।


उमर जमाल ने अपनी आँखें बंद कर लीं।


और बेहद धीमी आवाज़ में ख़ुद से कहने लगा—


"इस दुनिया को कैसे समझाऊँ...


तेरे बिना तो साँस लेना भी अधूरा लगता है।


तुझे भूलने का तसव्वुर भी गुनाह महसूस होता है।


और मोहब्बत में गुनाह करना...


मेरे रब ने हराम ठहराया है..."


उसने दर्द भरी मुस्कान के साथ सिर पीछे टिकाया।


"तुमने मुझे कभी अपनाया नहीं...


मगर अपनी ख़ामोशी से हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा तोड़ती रहीं।


और मैं...


हर रोज़ उसी ख़ामोशी से मोहब्बत करता रहा..."





इस कहानी में आगे क्या हो सकता है?

क्या उमर जमाल को पता चलेगा कि वही लड़की रामना वकार थी, जिसने उस मासूम बच्ची की जान बचाई थी?

क्या रामना और उमर जमाल की पहली मुलाक़ात एक नई कहानी की शुरुआत बनेगी?


और क्या अतीत के ज़ख्म आने वाले रिश्तों की तक़दीर बदल देंगे?

इस भाग से हमें क्या सीख मिलती है?

इंसान की असल पहचान उसके लिबास या पहली नज़र से नहीं, बल्कि उसके किरदार और रहमदिल होने से होती है।

जल्दबाज़ी में किसी के बारे में राय बना लेना अक्सर ग़लत साबित हो सकता है।

सच्ची मोहब्बत वक्त के साथ कम नहीं होती, बल्कि इम्तिहानों में और गहरी हो जाती है।

अतीत के राज़ कभी न कभी सामने ज़रूर आते हैं।


Readers ke liye Shukriya SMS

मेरे अज़ीज़ पाठकों,

दिल की गहराइयों से आपका शुक्रिया, जो आप "राहे बिस्मिल्ल" को इतना प्यार दे रहे हैं। आपका हर लाइक, कमेंट और दुआ मुझे बेहतर लिखने का हौसला देती है। उम्मीद है कि आप आगे भी इसी तरह इस सफ़र का हिस्सा बने रहेंगे।

📢 सूचना:

"राहे बिस्मिल्ल" का अगला भाग 23/07/2026 को रात 11:00 बजे प्रकाशित किया जाएगा।

इंशाअल्लाह, मिलते हैं कहानी के अगले रोमांचक हिस्से में। 🤍

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