राहे बिस्मिल्ल – मोहब्बत की ख़ामोश तड़प | Shabe Noor और Umar Jamal की दर्दभरी कहानी (Part 6)
रमना ने हल्की-सी मुस्कान अपने होंठों पर सजाई, लेकिन उसकी आँखों की थकान उसके दिल का हाल बयाँ कर रही थी।
“अल्हम्दुलिल्लाह... पहला दिन अच्छा रहा, बाबा। सब लोग बहुत अच्छे थे। उन्होंने मेरा अच्छी तरह इस्तक़बाल किया और काम भी समझाया।”
“और काम समझ में आ गया?”
वक़ार साहब ने एक्सााइटेड होकर पूछा।
“जी बाबा, शुरू में थोड़ा मुश्किल लगा था... लेकिन धीरे-धीरे सब समझ आने लगा। इंशाअल्लाह, कुछ दिनों में सब ठीक से सीख जाऊँगी।”
“मुझे मेरी बेटी पर पूरा यक़ीन है। जिस तरह तुमने हर मुश्किल का सामना किया है, उसी तरह इस नई ज़िम्मेदारी को भी बहुत अच्छे से निभाओगी।”
रमना ने बस मुस्कुराकर सिर हिला दिया।
वक़ार साहब उसकी आँखों में झाँकते हुए कुछ पल ख़ामोश रहे। एक बाप अपनी औलाद के चेहरे से उसके दिल का हाल पढ़ लेता है।
“लेकिन...” उन्होंने नरमी से कहा, “मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि मेरी बेटी कुछ परेशान है? चेहरे पर मुस्कुराहट है... मगर आँखें कुछ और कह रही हैं।”
यह सुनते ही रमना का दिल एक पल को ज़ोर से धड़का।
उसे ऑफिस का हर लम्हा याद आने लगा—वह केबिन... वह रौबदार शख़्स... और उसकी वह ठंडी, गहरी निगाहें, जिनसे नज़रें मिलाने की हिम्मत भी रमना नहीं कर पाई थी।
मगर अगले ही पल उसने उन तमाम ख़यालों को अपने दिल में दफ़्न कर दिया।
“नहीं बाबा,” उसने बनावटी मुस्कान के साथ कहा, “ऐसी कोई बात नहीं है। शायद नए माहौल की वजह से थोड़ी थक गई हूँ।”
वक़ार साहब ने बिना कुछ कहे उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा।
“ठीक है... लेकिन याद रखना, अगर कभी कोई बात दिल पर बोझ बन जाए, तो सबसे पहले अपने बाबा को बताना। दुनिया चाहे कुछ भी कहे, तुम्हारे बाबा हमेशा तुम्हारे साथ खड़े मिलेंगे।”
यह सुनकर रमना की आँखें हल्की-सी नम हो गईं।
वह झुककर अपने बाबा के कंधे से लग गई।
“अल्लाह आपको हमेशा सलामत रखे, बाबा।”
वक़ार साहब मुस्कुरा दिए और उसके सिर को चूम लिया।
उन्हें क्या पता था कि उनकी बेटी की ज़िंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान तो अभी शुरू भी नहीं हुआ था... और तक़दीर बहुत जल्द उसे उस शख़्स के सामने बार-बार लाने वाली थी, जिससे बचने की वह हर मुमकिन कोशिश करेगी।
— Shabe Noor —
“या अल्लाह... आखिर मेरी मोहब्बत में ऐसी कौन-सी कमी रह गई है?
उनका यूँ मुझे नज़रअंदाज़ करना मेरी रूह तक को ज़ख़्मी कर देता है।
मैं जितनी शिद्दत से उन्हें चाहती हूँ, उतनी ही बेरुख़ी से वो मुझसे मुँह मोड़ लेते हैं।
क्या उन्हें कभी मेरी आँखों में अपने लिए इंतज़ार नज़र नहीं आता?
क्या उन्हें कभी मेरे दिल की धड़कनों की आवाज़ सुनाई नहीं देती?
मैं तो बहुत पहले ही अपनी हर ख़ुशी, हर दुआ, हर ख़्वाब उनके नाम कर चुकी हूँ...
फिर भी...
मेरी मोहब्बत उनके दिल तक क्यों नहीं पहुँच पाती?”
Shabe Noor की आँखें बेइख़्तियार दरवाज़े पर टिक गईं।
आज भी उसे उसी एक लम्हे का इंतज़ार था... जब उमर जमाल घर लौटेंगे और शायद पहली बार मुस्कुराकर उससे कुछ कहेंगे।
लेकिन उसकी उम्मीदें अगले ही पल बिखर गईं।
वो घर में दाख़िल हुए। एक हाथ में अपना कोट थामे, चेहरे पर हमेशा की तरह वही सर्द संजीदगी...
उन्होंने एक बार भी Shabe Noor की तरफ़ देखना ज़रूरी नहीं समझा।
बिना रुके...
बिना कुछ कहे...
वो सीधे अपने कमरे की ओर बढ़ गए।
Shabe Noor की पलकों पर ठहरी उम्मीद उसी पल दम तोड़ गई।
लेकिन उसकी मोहब्बत का इम्तिहान अभी बाकी था।
घंटों रसोई में खड़े होकर उसने उनकी पसंद का खाना अपने हाथों से तैयार किया था।
उसे यक़ीन था कि शायद आज... सिर्फ़ आज... वो उसके हाथों का खाना साथ बैठकर खाएँगे।
मगर तभी Umar Jamal की ठंडी आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी—
“खाना मेरे कमरे में भिजवा देना।”
बस...
इतना ही।
न कोई शुक्रिया...
न कोई मुस्कुराहट...
न एक नज़र...
और न ही उसकी मौजूदगी का कोई एहसास।
Shabe Noor को ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी ने उसके दिल को अपनी मुट्ठी में लेकर बेरहमी से कुचल दिया हो।
उसकी साँसें भारी होने लगीं।
आँखों के सामने धुँधलका छा गया।
जिस खाने की ख़ुशबू कुछ देर पहले उसे अपनी मोहब्बत की महक लग रही थी...
अब वही ख़ुशबू उसके लिए किसी ज़हर से कम नहीं थी।
वो वहीं ख़ामोश खड़ी रह गई।
कमरे का दरवाज़ा बंद होने की हल्की-सी आवाज़ उसके दिल पर ऐसे गिरी... जैसे किसी ने उम्मीद की आख़िरी शमा भी बुझा दी हो।
उसकी आँखों से एक आँसू चुपचाप गिरा...
और उसने मुस्कुराने की नाकाम कोशिश करते हुए बस इतना कहा—
“शायद... मोहब्बत हमेशा पा लेने का नाम नहीं होती।”
मगर उसे क्या मालूम था...
जिस शख़्स की बेरुख़ी आज उसे तोड़ रही थी...
उसी शख़्स का दिल एक दिन उसकी जुदाई के ख़याल से भी काँप उठेगा।
उसके हाथ काँपने लगे।
आँखों के कोनों पर ठहरी नमी अब आँसुओं में बदल चुकी थी।
वह धीरे-धीरे पास रखी कुर्सी पर बैठ गई, जैसे उसके पैरों में अब खड़े रहने की भी ताक़त न बची हो।
“मैंने तुम्हारे लिए क्या नहीं किया, Umar...”
वह खुद से बुदबुदाई।
“हर दुआ में तुम्हें माँगा... हर साँस में तुम्हें बसाया...
फिर भी मैं तुम्हारे लिए इतनी बेमायने क्यों हूँ?”
किचन में रखा खाना ठंडा होता गया...
और Shabe Noor का दिल भी उसी तरह ठंडा और ख़ामोश पड़ता गया।
उसकी नज़र बार-बार उसी थाली पर जा टिकती, जिसमें उसने अपने हाथों से अपनी मोहब्बत घोलकर खाना बनाया था।
लेकिन आज...
उस मोहब्बत की कोई क़द्र नहीं थी।
कुछ देर बाद मुलाज़िमा आई।
उसने चुपचाप खाने की ट्रे उठाई और Umar Jamal के कमरे की ओर चली गई।
Shabe Noor ने उसकी तरफ़ देखा तक नहीं।
आज उसके पास आँसुओं के सिवा कुछ भी नहीं बचा था।
वह धीरे से उठी और खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई।
बाहर रात उतर चुकी थी...
और उसके दिल में भी एक लंबी, ख़ामोश रात उतर आई थी।
एक आँसू उसकी पलकों से फिसलकर गाल पर आ गिरा।
उसने आसमान की तरफ़ देखा और टूटी हुई आवाज़ में बस इतना कहा—
“शायद... मेरी मोहब्बत सच में उन्हें कभी दिखाई ही नहीं देगी...”
•••
Umar Jamal का कमरा
Umar जैसे ही कमरे में दाख़िल हुआ, दरवाज़ा बंद करते ही उसकी चाल की मज़बूती जैसे बिखर गई।
उसने अपना कोट बिस्तर पर फेंका और गहरी साँस लेकर खिड़की के पास जा खड़ा हुआ।
बाहर अँधेरा फैल चुका था...
और उसके भीतर भी।
उसकी आँखों के सामने बार-बार वही मंज़र घूम रहा था—
Shabe Noor की ख़ामोश आँखें...
उसका बेआवाज़ इंतज़ार...
और उसके चेहरे पर बिखरता हुआ दर्द।
मुलाज़िम ने आकर खाना मेज़ पर रख दिया और बिना कुछ कहे चला गया।
कमरे में फिर वही ख़ामोशी लौट आई।
Umar धीरे-धीरे मेज़ के पास आया।
उसने एक निवाला उठाया...
मगर जैसे ही उसे मुँह तक ले गया, उसका गला भर आया।
उसने निवाला वापस थाली में रख दिया।
दोनों हाथ मेज़ पर टिकाकर उसने सिर झुका लिया।
“मुझसे यह सब क्यों नहीं संभलता...?”
उसकी आवाज़ बेहद धीमी थी।
“अगर मैं उसकी आँखों में ज़रा देर भी देख लूँ...
तो शायद अपने ही फ़ैसले से डगमगा जाऊँ...
और मुझे डगमगाने की इजाज़त नहीं है।”
उसने आँखें बंद कर लीं।
लेकिन बंद पलकों के पीछे भी वही चेहरा था...
नम आँखें...
टूटी हुई उम्मीद...
और एक ऐसी ख़ामोश मोहब्बत...
जिससे वह जितना दूर भागना चाहता था, उतनी ही गहराई से वह उसके दिल में उतरती जा रही थी।
Umar Jamal ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं।
“नहीं... अब बहुत देर हो चुकी है।”
उसने जैसे खुद को ही यह यक़ीन दिलाने की कोशिश की।
“जिस रास्ते पर मैं चल पड़ा हूँ, वहाँ जज़्बात की कोई जगह नहीं है। अगर मैं एक पल के लिए भी कमज़ोर पड़ा... तो सिर्फ़ मैं नहीं, बहुत से लोग बर्बाद हो जाएँगे।”
उसकी आवाज़ धीमी थी, मगर उसमें छुपा दर्द साफ़ महसूस हो रहा था।
उसने मेज़ पर रखी थाली की ओर फिर देखा।
हर निवाला उसे Shabe Noor की ख़ामोश मोहब्बत की याद दिला रहा था।
उसने काँपते हाथों से एक और निवाला उठाया, लेकिन इस बार भी वह उसे निगल न सका।
थाली धीरे से एक तरफ़ सरका दी।
“माफ़ कर दो, Shabe Noor...”
ये अल्फ़ाज़ उसके होंठों तक आए, मगर आवाज़ बनकर बाहर न निकल सके।
उसी वक़्त उसकी नज़र मेज़ पर रखी एक पुरानी तस्वीर पर पड़ी।
तस्वीर में एक मुस्कुराता हुआ परिवार था...
और उसी तस्वीर के एक कोने पर किसी के ख़ून का हल्का-सा सूखा धब्बा अब भी मौजूद था।
Umar Jamal की आँखों में एक पल में सर्दी उतर आई।
उसने तस्वीर को उठाकर देर तक देखा।
“मैं अपना वादा नहीं भूल सकता...”
उसने बुदबुदाते हुए तस्वीर को वापस रख दिया।
“जिस दिन मेरा मक़सद पूरा हो जाएगा... अगर उस दिन मेरी साँसें बाकी रहीं... तब शायद मैं अपने दिल की भी सुन सकूँ।”
उसने गहरी साँस ली और कमरे की बत्तियाँ बुझा दीं।
पूरा कमरा अँधेरे में डूब गया।
लेकिन उससे कहीं ज़्यादा अँधेरा उसके दिल के अंदर था।
इस कहानी में आगे क्या हो सकता है?
Shabe Noor की ख़ामोशी Umar Jamal के दिल को और बेचैन करने लगेगी।
Umar Jamal एक ऐसा फैसला ले सकता है जो Shabe Noor को उससे और दूर कर दे।
Ramna की नई नौकरी में कुछ ऐसे राज़ सामने आने शुरू होंगे जो पूरी कहानी की दिशा बदल देंगे।
Zaryab Ikhtiyar की ज़िंदगी का छुपा हुआ सच धीरे-धीरे सामने आने लगेगा।
आने वाले भागों में रिश्तों की असली परीक्षा और कई चौंकाने वाले खुलासे कहानी को नया मोड़ देंगे।
इस भाग से हमें क्या सीख मिलती है?
सच्ची मोहब्बत सिर्फ़ अपने जज़्बात जताने का नाम नहीं, बल्कि सब्र, समझ और भरोसे का भी इम्तिहान होती है। कई बार सामने वाला ख़ामोश होता है, लेकिन उसकी ख़ामोशी के पीछे ऐसी मजबूरियाँ छिपी होती हैं जिनसे हम अनजान रहते हैं। इसलिए किसी के व्यवहार को समझे बिना उस पर फ़ैसला नहीं सुनाना चाहिए।
अगले भाग की छोटी-सी झलक
अगले भाग में...
क्या Umar Jamal अपनी ख़ामोशी की दीवार को और ऊँचा कर देगा?
क्या Shabe Noor की मोहब्बत एक नई परीक्षा से गुज़रेगी?
और Ramna की ज़िंदगी में आने वाला कौन-सा नया मोड़ सबकी तक़दीर बदल देगा?
इन सभी सवालों के जवाब मिलेंगे कहानी के अगले भाग में...
Readers के लिए शुक्रिया संदेश
Writing
peyare dosto,
आप सभी का दिल से शुक्रिया कि आप "राहे बिस्मिल्ल" को इतना प्यार, दुआएँ और अपना कीमती समय दे रहे हैं। आपका हर व्यू, हर कमेंट और हर दुआ मुझे बेहतर लिखने की हिम्मत देती है।
अगर आपको यह भाग पसंद आया हो, तो कृपया अपनी राय कमेंट में ज़रूर साझा करें और कहानी को अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करें।
📖 "राहे बिस्मिल्ल" का अगला भाग 26/07/2026 को प्रकाशित किया जाएगा।
इंशाअल्लाह, अगला भाग और भी ज़्यादा भावनात्मक, रहस्यमयी और दिल को छू लेने वाला होगा।
अल्लाह हाफ़िज़! 🤍 — Afsana Wahid



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