राहे बिस्मिल्ल | उम्र जमाल के कमरे में पकड़ी गई शबे नूर! क्या अब टूट जाएगा उसका दिल? | Episode 2
उसकी तस्वीर के सामने...
शबे नूर...
बड़ी-बड़ी सुनहरी, चमकती आँखें, जिनमें जैसे सुनहरे मौसम बसते हों। गुलाब की पंखुड़ियों जैसे उभरे हुए गुलाबी गाल, दिल की शेव वाले मुलायम होंठ, लंबी और नफ़ीस नाक, जिसकी नोक पर सजी छोटी-सी डायमंड नोज़ रिंग उसकी हुस्न को और भी दिलकश बना देती थी।
उसका लंबा, क़द उमर जमाल के कंधों तक आता था और उसका सलीकेदार अंदाज़ उसे देखने वाले को पहली ही नज़र में ठहर जाने पर मजबूर कर देता था।
इस वक़्त उसने पीच रंग का खूबसूरत प्लाज़ो सूट पहन रखा था। उसके खुले, रेशमी बाल हवा के हल्के झोंकों के साथ बार-बार उसके चेहरे को छू रहे थे।
वो बेहद आहिस्ता से कमरे का दरवाज़ा खोलकर अंदर दाख़िल हुई।
दरवाज़ा खुलते ही हल्की-सी हवा कमरे में फैल गई।
पर्दे नर्म लहरों की तरह हिलने लगे और पूरे कमरे में वही जानी-पहचानी खुशबू बिखर गई, जो हमेशा उम्र जमाल की मौजूदगी का एहसास दिलाती थी।
शबे नूर ने गहरी साँस ली।
उस खुशबू को महसूस करते ही उसके होंठों पर एक बेहद मासूम मुस्कान आ गई।
उसकी नज़र पूरे कमरे में घूमी।
हर चीज़ अपनी जगह करीने से रखी हुई थी।
किताबें, मेज़, परदे, सोफ़ा...
और फिर उसकी नज़र दीवार पर जाकर ठहर गई।
वहाँ उमर जमाल की एक बड़ी-सी तस्वीर लगी थी।
थ्री-पीस सूट में...
गाल पर हल्का-सा हाथ रखे...
लबों पर वही दिल जीत लेने वाली मुस्कान...
ऐसा लगता था जैसे सारी दुनिया की रौशनी उसी मुस्कुराहट में सिमट आई हो।
शबे नूर की आँखें उसी तस्वीर पर ठहर गईं।
वो उन लोगों में से थी जो उमर जमाल की मुस्कान पर हर बार अपना दिल हार बैठती थीं।
उसने बेहद आहिस्ता से तस्वीर को देखते हुए कहा—
«"उफ़्फ़... उमर जमाल...
आपके चेहरे की ये मुस्कान देखकर...
मेरा बार-बार जीने को दिल करता है..."»
उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि अगर कोई उसके बिल्कुल पास भी खड़ा होता तो शायद साफ़ न सुन पाता।
वो धीरे-धीरे चलते हुए उसके आलीशान बिस्तर के किनारे जाकर बैठ गई।
कुछ पल तक बस कमरे की ख़ामोशी को महसूस करती रही।
फिर सामने रखी मेज़ से उसने एक और फोटो फ्रेम उठा लिया।
इस तस्वीर में उम्र जमाल का अंदाज़ बिल्कुल अलग था।
काली शर्ट...
आँखों पर हल्का-सा चश्मा...
और गहरी, ठहरी हुई नज़रें...
जैसे देखने वाले को अपनी निगाहों में क़ैद कर लेने का हुनर जानती हों।
शबे नूर ने तस्वीर को दोनों हाथों से थाम लिया।
कुछ लम्हों तक वो बस उसे देखती रही।
फिर शर्म से मुस्कुराते हुए बोली—
«"प्लीज़... उमर...
इस तरह मत देखा कीजिए...
डर लगता है मुझे..."»
उसने झेंपकर अपना चेहरा हथेलियों में छिपा लिया।
उसके गुलाबी गाल अब और भी लाल हो चुके थे।
दिल की धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि उसे खुद महसूस हो रहा था जैसे वो उसकी साँसों के साथ बाहर निकल आएँगी।
कुछ पल बाद उसने उँगलियों के बीच से तस्वीर की तरफ़ फिर झाँका और हल्की-सी हँसी उसके होंठों पर बिखर गई।
«"तस्वीर में भी...
आपकी नज़रों का सामना नहीं कर पाती मैं..."»
उसने तस्वीर को अपने सीने के करीब कर लिया।
उसकी बड़ी-बड़ी सुनहरी आँखों में मोहब्बत साफ़ दिखाई दे रही थी।
कमरे की ख़ामोशी अब उसे अच्छी लगने लगी थी।
ऐसा महसूस हो रहा था जैसे दीवार पर लगी हर तस्वीर उससे बातें कर रही हो।
वो बेहद धीमी आवाज़ में बुदबुदाई—
«"उमर...
क्या आप मेरे दिल की बात नहीं समझ सकते?
क्या आपको कभी एहसास नहीं होता...
कि मैं...
मैं आपसे हद से ज़्यादा इश्क़ करती हूँ..."»
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
हर लफ़्ज़ उसके दिल की गहराइयों से निकल रहा था।
उसकी पलकों पर नमी उतर आई।
एक आँसू चुपके से उसके गाल पर लुढ़क गया।
लेकिन उसने उसे पोंछा नहीं।
वो मुस्कुराती रही।
ऐसा लग रहा था जैसे तस्वीर के उस पार बैठा उमर जमाल सचमुच उसकी हर बात सुन रहा हो।
उसे बिल्कुल एहसास नहीं था...
कि उसी वक़्त...
कमरे का दरवाज़ा एक बार फिर बेहद आहिस्ता से खुल चुका था।
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उमर जमाल वापस आ चुका था।
कमरे में दाख़िल होते ही उसकी नज़र सबसे पहले अपने बिस्तर पर बैठी उस लड़की पर पड़ी।
उसकी पीठ उसकी तरफ़ थी।
वो पूरी तरह उसकी तस्वीर में खोई हुई थी।
उसके होंठ अब भी बेहद धीमी रफ़्तार से हिल रहे थे।
हर लफ़्ज़ में उमर जमाल का नाम था।
हर साँस में उसी की मौजूदगी।
लेकिन उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि कमरे की ख़ामोशी भी उसे अपने अंदर समेटे हुए थी।
उमर जमाल वहीं ठिठक गया।
उसकी निगाह फिर उस फोटो फ्रेम पर गई जो इस वक़्त शबे नूर के हाथों में था।
फिर उसने शबे नूर का चेहरा देखा।
आँखों की नमी...
लबों की मासूम मुस्कान...
और उस चेहरे पर बिखरा बेइंतिहा इश्क़...
ये कोई दिखावा नहीं था।
ये मोहब्बत थी...
बेहद सच्ची...
बेहद पाक...
कुछ लम्हों तक वो बिना कुछ कहे उसे देखता रहा।
जैसे उसे यक़ीन ही न आ रहा हो कि कोई उसे इतनी शिद्दत से चाह भी सकता है।
आख़िर उसने अपनी वही रौबदार मगर गहरी आवाज़ में कहा—
«"शबे नूर...
तुम यहाँ...?"»
उसकी आवाज़ सुनते ही शबे नूर का पूरा जिस्म सिहर उठा।
उसकी उँगलियाँ काँप गईं।
फोटो फ्रेम उसके हाथों से लगभग छूट ही गया था।
लेकिन उसने फौरन संभाल लिया।
उसने जल्दी से तस्वीर वापस मेज़ पर रख दी।
धीरे-धीरे पलटी...
और जैसे ही उसकी नज़र उमर जमाल से मिली...
उसकी साँस वहीं अटक गई।
चेहरे का रंग एक पल में बदल गया।
गुलाब जैसे गाल शर्म से और भी सुर्ख़ हो गए।
दिल इस क़दर ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे लगा कहीं उसकी धड़कनों की आवाज़ उमर जमाल तक न पहुँच जाए।
वो अपने दुपट्टे की किनारी को घबराहट में उँगलियों से मरोड़ने लगी।
नज़रें उठाने की हिम्मत नहीं हो रही थी।
ऐसा लग रहा था जैसे वो अपने दिल का सबसे बड़ा राज़ उसी इंसान के सामने खोले बैठी हो... और अब उसके पास छिपाने के लिए कुछ भी बाकी न रहा हो।
मगर इस वक़्त उमर जमाल के ज़ेहन में सिर्फ़ रमना वकार के कहे हुए अल्फ़ाज़ ही गूँज रहे थे।
उसका चेहरा पहले ही संजीदा था और आँखों में सोच की गहरी परछाइयाँ उतर आई थीं। वो किसी और ही उलझन में घिरा हुआ था। ऐसे में अपने कमरे में शबे नूर की मौजूदगी उसे बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगी।
उसने एक नज़र कमरे पर डाली, फिर अपनी तस्वीर की तरफ़ देखा जो अभी कुछ लम्हे पहले शबे नूर के हाथों में थी। उसकी भौंहें हल्की-सी सिकुड़ गईं।
गहरी और सख़्त आवाज़ में उसने दोबारा पूछा—
«"शबे नूर... तुम मेरे कमरे में क्या कर रही हो?"»
उसके लहज़े की सख़्ती साफ़ महसूस की जा सकती थी।
उसकी आवाज़ में न गुस्सा ऊँचा था, न कोई शोर... लेकिन ऐसी सख्ती थी जिसने शबे नूर के दिल की धड़कनें और तेज़ कर दीं।
शबे नूर कुछ पल के लिए बिल्कुल ख़ामोश रह गई।
उसे तो इस बात का ज़रा-सा भी इल्म नहीं था कि उम्र जमाल इस वक़्त अचानक अपने कमरे में लौट आएगा।
अगर उसे इसका अंदाज़ा होता, तो शायद वो कभी यहाँ आने की हिम्मत ही न करती।
उसके होंठ कई बार खुले, मगर कोई लफ़्ज़ बाहर न आ सका।
वो समझ ही नहीं पा रही थी कि उम्र जमाल के सवाल का क्या जवाब दे।
क्या सच बता दे कि वो उसकी तस्वीरों से बातें कर रही थी?
या कोई बहाना बना ले?
दिल और ज़ेहन जैसे एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े हो गए थे।
घबराहट में उसकी उँगलियाँ दुपट्टे के किनारे को मसलने लगीं, जबकि उसकी झुकी हुई नज़रें अब भी फ़र्श पर टिकी थीं।
कमरे में एक बार फिर ख़ामोशी उतर आई...
ऐसी ख़ामोशी, जिसमें सिर्फ़ शबे नूर की बेक़ाबू धड़कनों की गूँज थी... और उम्र जमाल की इंतज़ार करती हुई सख़्त निगाहें।
,,,,,,जारी,,,,,,
आगे क्या हो सकता है? (Spoiler दिए बिना)
उम्र जमाल शबे नूर से सख़्त लहज़े में जवाब माँगेगा।
शबे नूर सच बोलने और अपने जज़्बात छिपाने के बीच उलझ जाएगी।
रमना वकार की कही बातें उम्र जमाल के फ़ैसलों को और मुश्किल बना देंगी।
एक ऐसा मोड़ आएगा जो दोनों के रिश्ते की दिशा बदल सकता है।
इस भाग से हमें क्या सीख मिलती है?
सच्ची मोहब्बत सिर्फ़ चाहने का नाम नहीं, बल्कि सब्र, अदब और सही वक़्त का इंतज़ार करने का भी नाम है। कभी-कभी दिल की सबसे सच्ची बातें भी हर वक़्त ज़ाहिर नहीं की जा सकतीं।
Next Part (Short Teaser)
अगले भाग में...
शबे नूर की ख़ामोशी और उम्र जमाल के सख़्त सवाल आमने-सामने होंगे। क्या शबे नूर अपने दिल का राज़ छिपा पाएगी, या उसकी आँखें सब कुछ बयां कर देंगी? जानने के लिए अगला भाग ज़रूर पढ़िए।
Readers के लिए Thank You Message
प्रिय पाठकों,
आप सभी का दिल से शुक्रिया कि आप राहे बिस्मिल्ल को इतना प्यार और अपना कीमती वक़्त दे रहे हैं। आपके कमेंट्स, दुआएँ और हौसला-अफ़ज़ाई ही मुझे बेहतर लिखने की प्रेरणा देती है।
इंशाअल्लाह, "राहे बिस्मिल्ल" का अगला भाग कल रात ठीक 11:00 बजे प्रकाशित किया जाएगा।
तब तक अपने ख़याल रखिए, दुआओं में याद रखिए, और कहानी के साथ जुड़े रहिए।
– आपकी लेखिका,
अफ़साना वाहिद



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