राहे बिस्मिल्ल भाग 3 | Shabe Noor की मोहब्बत और Umar Jamal का टूटा हुआ अतीत | Emotional Hindi Novel

 




"वो... वो तस्वीर पर थोड़ी धूल लग गई थी...

मैं बस... वही साफ़ कर रही थी..."


Shabe Noor ने हड़बड़ाकर कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी और शब्द एक-दूसरे से उलझते जा रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो वो अपने झूठ से ज़्यादा अपनी धड़कनों को छिपाने की कोशिश कर रही हो।


उसने जल्दी से बिस्तर से उठकर अपने दुपट्टे को सँभाला और नज़रें झुका लीं।


कमरे में कुछ पल के लिए ऐसी ख़ामोशी छा गई कि दोनों की साँसों की आवाज़ तक साफ़ सुनाई दे रही थी।


Umar Jamal कुछ देर तक उसे बिना कुछ कहे देखता रहा।


उसकी गहरी नज़रें Shabe Noor के चेहरे पर ठहर गईं। उसे साफ़ महसूस हो रहा था कि ये लड़की किसी बात से घबराई हुई है, लेकिन वजह क्या थी... ये वो समझ नहीं पा रहा था।


कुछ पल बाद उसने अपने लहजे की सख़्ती को थोड़ा कम करते हुए कहा—


"क्या तुम्हें पता नहीं... किसी के कमरे में इस तरह बिना इजाज़त दाख़िल नहीं होते?"


आवाज़ में गुस्सा नहीं था...


बस एक हल्की-सी सख़्ती थी।


ऐसी सख़्ती, जो किसी को डराने के लिए नहीं बल्कि एक उसूल याद दिलाने के लिए होती है।


Shabe Noor ने होंठ भींच लिए।


उसके पास कोई जवाब नहीं था।


वो चाहकर भी नहीं कह सकती थी कि वो इस कमरे में चोरी करने नहीं...


बल्कि उस इंसान की एक झलक देखने आई थी जिसके नाम से उसकी हर सुबह शुरू होती थी और हर रात ख़त्म।


उसने धीरे से सिर झुका लिया।


दोनों हाथ आपस में कसकर बाँध लिए।


फिर बिना उसकी तरफ़ देखे दरवाज़े की ओर बढ़ गई।


दरवाज़े तक पहुँचकर उसके कदम एक पल को रुके।


उसने बिना पलटे बहुत धीमी आवाज़ में कहा—


"माफ़ कीजिए..."


और अगले ही पल वो कमरे से बाहर चली गई।


उसके जाते ही कमरे में फिर वही ख़ामोशी लौट आई।


Umar Jamal कुछ सेकंड तक बंद होते दरवाज़े को देखता रहा।


फिर उसने हल्के से सिर हिलाया और होंठों पर एक फीकी-सी मुस्कान आ गई।


"अजीब लड़की है..."


उसने बुदबुदाते हुए कहा।


लेकिन तभी उसकी नज़र सामने रखी अपनी तस्वीर पर पड़ी।


तस्वीर के शीशे पर उँगलियों के हल्के-हल्के निशान थे।


ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उसे बहुत एहतियात से छुआ हो...


बहुत मोहब्बत से।


उसने तस्वीर उठाई।


अपनी हथेली से उसकी धूल साफ़ की।


कुछ पल तक तस्वीर को देखता रहा।


फिर खिड़की के बाहर ढलती शाम को देखते हुए उसके होंठों से अनजाने में एक जुमला निकला—


"पर... दिल में कुछ छोड़ गई है।"


खुद उसे भी समझ नहीं आया कि उसने ऐसा क्यों कहा।


वो कभी किसी लड़की के बारे में इस तरह नहीं सोचता था।


उसने हल्की-सी साँस ली।


"अजीब लड़की है ये..."


वो फिर मुस्कुराया।


"सीरियसली... ऐसे बर्ताव करती है जैसे मैं इसका क्या बिगाड़ दूँगा।"


उसने दरवाज़ा बंद किया।


अपनी शर्ट उतारकर बेड पर फेंक दी।


चेहरे पर हमेशा की तरह वही ठंडापन लौट आया।


"मुझे किसी भी लड़की में कोई दिलचस्पी नहीं..."


उसने खुद से कहा।


मानो अपने ही दिल को समझा रहा हो।


और फिर वॉशरूम की तरफ़ बढ़ गया।


उधर...


Shabe Noor लगभग भागती हुई उसके कमरे से निकली।


सीढ़ियाँ चढ़ते हुए वो अपने कमरे तक पहुँची।


दरवाज़ा बंद करते ही उसकी पीठ दीवार से लग गई।


वो ज़ोर-ज़ोर से साँसें लेने लगी।


ऐसा लग रहा था जैसे अभी-अभी किसी बड़ी मुसीबत से बचकर आई हो।


उसने काँपते हुए अपने सीने पर हाथ रखा।


दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि उसे लगा अभी बाहर आ जाएगा।


उसकी आँखों में आँसू भर आए।


वो धीरे से फुसफुसाई—


"Umar Jamal... आज तो आप मेरी चोरी पकड़ ही लेते..."


उसकी पलकों से आँसू गिर पड़े।


"आप नहीं जानते...


मैं आपसे कितनी मोहब्बत करती हूँ...


इतनी...


कि अगर कभी आपसे अलग हो गई...


तो शायद जी ही न पाऊँ..."


वो बोलते-बोलते रुक गई।


उसका गला भर आया।


"मर जाऊँगी..."


ये शब्द उसके होंठों से निकले ज़रूर...


मगर उसके साथ उसकी आँखों से दर्द का एक सैलाब भी बह निकला।


वो धीरे-धीरे फर्श पर


 बैठ गई।


घुटनों में चेहरा छिपा लिया।


और पहली बार उसे महसूस हुआ...


कि किसी से बेइंतहा मोहब्बत करना...


कभी-कभी सबसे बड़ी बेबसी भी बन जाता है।



भाग–2


वॉशरूम के अंदर बहते पानी की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी।


कुछ देर बाद पानी की आवाज़ थम गई।


दरवाज़ा खुला...


और Umar Jamal बाहर आया।


उसके बाल अभी भी भीगे हुए थे। पानी की बूँदें उसके माथे से होती हुई गर्दन तक उतर रही थीं। उसने तौलिये से बाल पीछे किए और धीमे क़दमों से कमरे के बीचों-बीच आकर रुक गया।


उसकी नज़र सबसे पहले बिस्तर पर पड़ी।


वहीं... जहाँ कुछ देर पहले Shabe Noor बैठी थी।


चादर पर अब भी हल्की-सी सिलवटें थीं।


कमरे की खुली खिड़की से आती शाम की ठंडी हवा परदों को हौले-हौले हिला रही थी।


लेकिन उस हवा में एक और चीज़ घुली हुई थी...


एक हल्की-सी खुशबू...


वही खुशबू जो कुछ देर पहले Shabe Noor के साथ इस कमरे में आई थी।


Umar Jamal अनजाने में ठिठक गया।


उसने गहरी साँस ली।


फिर जैसे खुद को झिड़कते हुए दूसरी तरफ़ देखने लगा।


"ये सब क्या सोच रहा हूँ मैं..."


उसने बुदबुदाकर कहा।


लेकिन जितना वो अपने ख़यालों से भागना चाहता था...


उतनी ही तेज़ी से Shabe Noor का काँपता हुआ चेहरा उसके सामने आ जाता।


उसे याद आया...


जब वो तस्वीर के सामने खड़ी घबरा रही थी।


जब उसकी आवाज़ काँप रही थी।


जब उसने झुकी हुई नज़रों से सिर्फ़ इतना कहा था—


"माफ़ कीजिए..."


उस एक शब्द में कितना डर था...


कितनी मासूमियत...


और न जाने क्यों...


उसे पहली बार महसूस हुआ कि उस लड़की की आँखों में कोई झूठ नहीं था।


वो कुछ कहना चाहती थी...


लेकिन कह नहीं पाई।


उसने बालों में हाथ फेरा और खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया।


डूबते सूरज की लाल रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी।


उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—


"कभी-कभी... कुछ लोग बहुत ग़लत वक़्त पर... बहुत सही लगने लगते हैं..."


ये कहते ही वो खुद चुप हो गया।


उसने जैसे अपने ही शब्द सुन लिए हों।


चेहरे का हर भाव पलभर में बदल गया।


उसने गर्दन झटका।


"नहीं..."


"ये सब फ़िज़ूल है।"


"मुझे किसी की ज़रूरत नहीं।"


"और न ही मैं किसी की ज़िंदगी का हिस्सा बनना चाहता हूँ।"


उसका चेहरा फिर पहले जैसा सख़्त हो गया।


वो कमरे से बाहर निकल गया।


लेकिन उसके जाते ही कमरे में वही खुशबू फिर फैल गई...


और ऐसा लगा...


जैसे दीवारें भी Shabe Noor की ख़ामोशी को महसूस कर रही हों।


---


उधर...


Shabe Noor अपने कमरे में अकेली बैठी थी।


खिड़की से रात धीरे-धीरे कमरे के अंदर उतर रही थी।


दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक पूरे कमरे में गूँज रही थी।


उसने अलमारी खोली।


अंदर से अपनी पुरानी नीले रंग की डायरी निकाली।


वही डायरी...


जिसमें वो अपने हर एहसास को अल्फ़ाज़ देती थी।


वो बिस्तर पर बैठी।


डायरी खोली।


पेन हाथ में लिया।


लेकिन जैसे ही लिखना चाहा...


आँखों से एक आँसू सीधे सफ़ेद पन्ने पर गिर पड़ा।


स्याही फैल गई।


उसने काँपते हाथों से लिखना शुरू किया—


"आज फिर मैंने खुद को टूटते देखा..."


"तुम्हारे एक वाक्य ने...


मेरी सारी हिम्मत छीन ली, Umar Jamal..."


उसने कुछ पल रुककर आँसू पोंछे।


फिर लिखा—


"तुम कहते हो तुम्हें किसी लड़की में कोई दिलचस्पी नहीं..."


"पर मैं क्या करूँ...


उस दिल का...


जो सिर्फ़ तुम्हारे नाम से धड़कता है?"


उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।


आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।


उसने अगली पंक्ति लिखी—


**"काश...


तुम समझ पाते...


मोहब्बत कोई मज़ाक नहीं होती..."**


"वो धीरे-धीरे इंसान की साँसों में उतर जाती है...


और फिर...


उसी के साथ जीना सिखा देती है।"


पन्ना आँसुओं से भीग चुका था।


स्याही जगह-जगह फैल गई थी।


उसने पेन बंद कर दिया।


डायरी सीने से लगा ली।


और दीवार से सिर टिकाकर आँखें बंद कर लीं।


कुछ देर बाद उसके होंठ हिले—


"Umar Jamal..."


"अगर तुम एक बार...


सिर्फ़ एक बार...


पलटकर मुझे देख लेते...


तो शायद ये दिल इतनी तकलीफ़ में न होता।"


कमरे में कोई जवाब देने वाला नहीं था।


सिर्फ़ खिड़की से आती हवा थी...


जो उसके बिखरे बालों को छूकर गुज़र रही थी।


रात और गहरी होती गई।


लेकिन Shabe Noor की आँखों में नींद नहीं उतरी।


उसकी पलकों पर सिर्फ़ इंतज़ार था...


और दिल में...


एक ऐसी मोहब्बत...


जिसे उसने कभी ज़ुबान नहीं दी।




भाग–3


रात अपने पूरे सन्नाटे के साथ बंगले पर उतर चुकी थी।


दीवार पर लगी घड़ी की सुइयाँ ठीक दो बजे पर आकर ठहर गई थीं।


पूरा बंगला ख़ामोश था।


हर कमरे की बत्तियाँ बुझ चुकी थीं।


हर तरफ़ सुकून था...


लेकिन उस सुकून के बीच दो दिल ऐसे थे जिन्हें नींद छू भी नहीं पा रही थी।


---


Umar Jamal अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ा था।


उसके हाथ में आधी भरी कॉफ़ी का मग था...


जो कब का ठंडा हो चुका था।


मगर उसे इसका एहसास तक नहीं था।


उसकी आँखें बाहर फैले अँधेरे पर थीं...


लेकिन उसका ज़ेहन कहीं और भटक रहा था।


बार-बार वही चेहरा...


वही काँपती हुई आवाज़...


वही मासूम आँखें...


और वही एक जुमला...


"अगर कभी आपसे अलग हो गई... तो मैं मर जाऊँगी..."


उसने बेचैनी से आँखें बंद कर लीं।


"ये लड़की..."


वो धीमे से बुदबुदाया।


"आख़िर मेरे बारे में इतना क्यों सोचती है...?"


उसने खुद को समझाने की कोशिश की।


"मुझे इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता..."


लेकिन अगले ही पल उसके अपने दिल ने उसकी बात झुठला दी।


कमरे में घुटन-सी महसूस होने लगी।


उसने गहरी साँस ली...


और खिड़की खोल दी।


ठंडी हवा का झोंका अंदर आया।


उसी हवा के साथ एक बहुत हल्की...


बहुत टूटी हुई...


सिसकी उसके कानों तक पहुँची।


वो एकदम ठिठक गया।


उसने ध्यान से सुना।


फिर वही आवाज़...


इस बार पहले से ज़्यादा साफ़।


जैसे कोई अपना दर्द दबाने की कोशिश कर रहा हो...


लेकिन हर कोशिश नाकाम हो रही हो।


उसने भौंहें सिकोड़ लीं।


"ये आवाज़..."


कुछ पल बाद उसे एहसास हुआ...


ये Shabe Noor थी।


उसकी रुलाई में कोई बनावट नहीं थी।


वो किसी को सुनाने के लिए नहीं रो रही थी।


वो अकेले में...


अपने टूटे हुए दिल के साथ रो रही थी।


न जाने क्यों...


Umar Jamal के सीने में एक अजीब-सी कसक उठी।


उसने आँखें बंद कीं।


"मुझे इससे क्या..."


उसने खुद से कहा।


लेकिन उसके पैर वहीं नहीं रुके।


वो दरवाज़े तक गया।


हाथ आगे बढ़ाया...


फिर वापस खींच लिया।


"नहीं..."


"ये ठीक नहीं होगा..."


उसने खुद को रोका।


मगर अगले ही पल अंदर से फिर वही सिसकी सुनाई दी।


इस बार पहले से भी ज़्यादा दर्दनाक।


उसने बिना कुछ सोचे दरवाज़ा खोल दिया।


गलियारे में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था।


दीवारों पर लगी हल्की पीली रोशनी फ़र्श पर लंबी परछाइयाँ बना रही थी।


वो धीरे-धीरे चलता हुआ सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।


हर कदम के साथ उसके दिल की धड़कन तेज़ होती जा रही थी।


आख़िरकार...


वो Shabe Noor के कमरे के सामने आकर रुक गया।


दरवाज़े के उस पार अब भी धीमी-धीमी रुलाई सुनाई दे रही थी।


उसने काँपते हाथ से दरवाज़े पर बहुत हल्की-सी दस्तक दी।


ठक... ठक...


अंदर एक पल को ख़ामोशी छा गई।


फिर दोबारा सिसकियों की आवाज़ आने लगी।


Umar Jamal ने पहली बार बेहद नरम आवाज़ में पुकारा—


"Shabe Noor..."


उसकी आवाज़ में न सख़्ती थी...


न दूरी...


सिर्फ़ एक अनकहा अपनापन था।


लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया।


Shabe Noor ने उसकी आवाज़ पहचान ली थी।


उसने झट से अपने होंठों पर हाथ रख लिया...


ताकि उसकी रुलाई बाहर तक न पहुँचे।


उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।


वो चाहती थी...


भागकर दरवाज़ा खोल दे...


उसे देख ले...


बस एक बार।


लेकिन उसके कदम जैसे ज़मीन से चिपक गए थे।


उसने सिर घुटनों पर रख लिया।


धीरे से फुसफुसाई—


"या अल्लाह... मुझे सब्र दे..."


बाहर खड़ा Umar Jamal कुछ देर तक दरवाज़े को देखता रहा।


उसने महसूस किया...


कि इस दरवाज़े के पीछे सिर्फ़ एक कमरा नहीं...


बल्कि किसी का टूटता हुआ दिल है।


उसने धीरे से आँखें बंद कर लीं।


और पहली बार उसके दिल में एक अजीब-सा अपराधबोध जागा।


"शायद..."


"शायद मैंने इसे ज़रूरत से ज़्यादा तकलीफ़ दे दी।"


कुछ पल तक वो वहीं खड़ा रहा।


फिर बिना कुछ कहे वापस मुड़ गया।


गलियारे में उसके कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे दूर होती गई।


लेकिन उसके दिल में Shabe Noor की सिसकियाँ अब भी गूँज रही थीं।


उसे पहली बार एहसास हुआ...


कि किसी की सच्ची मोहब्बत से दूर रहना...


खुद अपने लिए भी एक सज़ा बन जाता है।


वो सीढ़ियाँ उतरकर बंगले से बाहर आ गया।


रात ठंडी थी।


आसमान पर काले बादल छा चुके थे।


अचानक तेज़ हवा चली।


कुछ ही पलों बाद आसमान से पहली बारिश की बूँद ज़मीन पर गिरी।


Umar Jamal ने आसमान की तरफ़ देखा।


और उसी पल...


उसके दिल के बंद दरवाज़े पर भी एक पुरानी याद ने दस्तक दी।


एक चेहरा...


जिसे वो लाख भुलाना चाहता था...


मगर भूल नहीं पाया था।


Ramna Waqaar...


उसका नाम आते ही Umar Jamal की साँस जैसे सीने में अटक गई।


उसे लगा...


जैसे अतीत फिर से उसके सामने ज़िंदा खड़ा हो गया हो।


बारिश अब तेज़ होने लगी थी...


और उसके साथ...


वो दर्द भी...


जिसे उसने बरसों से अपने सीने में क़ैद कर रखा था...





आगे क्या हो सकता है?

क्या Umar Jamal अपने अतीत की ज़ंजीरों से निकल पाएगा? क्या Shabe Noor की सच्ची मोहब्बत उसके ज़ख्म भर पाएगी, या Ramna Waqaar की यादें उसे फिर उसी दर्द में धकेल देंगी? और अगर Shabe Noor को Umar Jamal के अतीत का पूरा सच पता चल गया, तो क्या उसकी मोहब्बत पहले जैसी रहेगी... या सब कुछ बदल जाएगा?

इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?

सच्ची मोहब्बत सिर्फ़ पाने का नाम नहीं, बल्कि सब्र, एहतराम और कुर्बानी का नाम भी है। इंसान का अतीत अक्सर उसके आज को प्रभावित करता है, इसलिए किसी के व्यवहार को समझने से पहले उसके दर्द को समझने की कोशिश करनी चाहिए।

Next Part (Short Teaser)

अगले भाग में पहली बार Ramna Waqaar और Umar Jamal के अतीत का एक ऐसा राज़ सामने आएगा, जिसने Umar Jamal को अंदर से बदल दिया। साथ ही Shabe Noor एक ऐसा फ़ैसला लेगी, जो उसकी पूरी ज़िंदगी की दिशा बदल सकता है।

Readers ke liye Shukriya Message

Writing

अस्सलामु अलैकुम, प्यारे पाठकों! ❤️

सबसे पहले, दिल की गहराइयों से आपका शुक्रिया कि आप "राहे बिस्मिल्ल" को इतना प्यार और अपना कीमती वक़्त दे रहे हैं। आपके हर कमेंट, दुआ और हौसला-अफ़ज़ाई से मुझे आगे लिखने की प्रेरणा मिलती है।

अगर आपको यह भाग पसंद आया हो, तो कृपया अपनी राय कमेंट में ज़रूर साझा करें और इस कहानी को अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करें।

इंशाअल्लाह, "राहे बिस्मिल्ल" का अगला भाग कल रात ठीक 11:00 बजे प्रकाशित किया जाएगा। 🌙

तब तक के लिए अपना और अपने अपनों का ख़याल रखिए।

फ़ी अमानिल्लाह। 🤍

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