राहे बिस्मिल्ल भाग 7: दादी अम्मी के फ़ैसले के ख़िलाफ़ पहली बार खड़ा हुआ Umar Jamal | क्या टूट जाएगा रिश्ता?

 




अब तक आपने पढ़ा कि Umar Jamal, Shabe Noor के हाथ के बनाए खाने को बिना चखे ही नज़रअंदाज़ करके अपने कमरे में चला जाता है। Umar Jamal की इस बेरुख़ी से Shabe Noor का दिल बुरी तरह टूट जाता है। वह समझ ही नहीं पाती कि आखिर उससे ऐसी कौन-सी ख़ता हो गई, जिसकी सज़ा उसे इस तरह मिल रही है। इसी उलझन और ग़म के बीच बेगम साहिबा (दादी अम्मी) उसे अपने कमरे में बुलाती हैं। वहाँ पहुँचकर Shabe Noor अनजाने में Umar Jamal और दादी अम्मी की बातचीत सुन लेती है। Umar Jamal दादी अम्मी के फ़ैसले के ख़िलाफ़ खड़ा होकर कहता है कि वह उनकी हर बात मान सकता है, लेकिन अपनी पूरी ज़िंदगी का फ़ैसला अपनी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ नहीं कर सकता। उसकी बातें सुनकर Shabe Noor हैरान रह जाती है और समझ नहीं पाती कि आखिर ऐसा कौन-सा फ़ैसला है जिसने पहली बार Umar Jamal को दादी अम्मी के सामने आवाज़ उठाने पर मजबूर कर दिया...


अब आगे पढ़िए...


Shabe Noor ने आईने में खुद को एक नज़र देखा।

आँखों की लाली साफ़ बता रही थी कि वह अभी-अभी रोई थी।

उसने जल्दी से अपने आँसू पोंछे, दुपट्टे को ठीक किया और एक गहरी साँस लेकर कमरे से बाहर निकल आई।

हवेली के लंबे गलियारे में अजीब-सी ख़ामोशी पसरी हुई थी।

बस उसके पायल की धीमी-धीमी छनक उस सन्नाटे को तोड़ रही थी।

हर क़दम के साथ उसे Umar Jamal का बेरुख़ा चेहरा याद आ रहा था।

बिना वजह उसकी आँखें फिर नम हो गईं।

"आख़िर मुझसे ऐसी क्या ग़लती हो गई... कि उन्होंने मेरी तरफ़ एक बार पलटकर देखना भी ज़रूरी नहीं समझा...?"

उसने दिल ही दिल में खुद से सवाल किया।

मगर अगले ही पल उसने सिर झटक दिया।


दरवाज़ा बंद था।

उस मुलाज़िमा  अदब से अपना हाथ उठाया...

और हल्के से दरवाज़े पर दस्तक दी।

ठक... ठक...



ठक… ठक…


दरवाज़े पर दस्तक हुई।


“कौन है?” उसने टूटे हुए लहजे में कहा।


“Shabe Noor बीबी जी, बेगम साहिबा आपको बुला रही हैं…” बाहर से मुलाज़िमा की मुलायम आवाज़ आई।


Shabe Noor ने गहरी साँस ली।


“ठीक है… तुम जाओ… मैं आ रही हूँ।”


मुलाज़िमा के जाते ही कमरे में फिर से ख़ामोशी छा गई।


Shabe Noor कुछ पल यूँ ही खड़ी रही।


उसकी नज़र अचानक ही उस दरवाज़े की तरफ़ उठी, जहाँ से कुछ देर पहले Umar Jamal बिना उसकी तरफ़ देखे चला गया था।


उसके सीने में फिर वही टीस उठी।


"क्या सचमुच उन्हें मेरी कोई परवाह नहीं...?"


उसने आँखें बंद करके अपने जज़्बात को क़ाबू में करने की कोशिश की।


नहीं...


वह किसी के सामने अपनी कमज़ोरी ज़ाहिर नहीं करना चाहती थी।


उसने अपने आँसू पोंछे, दुपट्टा ठीक किया और ख़ुद को सँभालते हुए कमरे से बाहर निकल आई।


हवेली के लंबे-चौड़े गलियारे में अजीब-सी ख़ामोशी पसरी हुई थी।


बस उसके पायल की खनक उस सन्नाटे को अपने नर्म सुरों से तोड़ रही थी।


उसके खुले, लंबे और रेशमी बाल हवा के हल्के झोंकों से बार-बार उसके चेहरे पर आ रहे थे।


उसने नर्मी से उन्हें पीछे किया और धीमे क़दमों से दादी अम्मी के कमरे की तरफ़ बढ़ने लगी।


हर क़दम के साथ उसके दिल की बेचैनी बढ़ती जा रही थी।


"दादी अम्मी ने अचानक मुझे क्यों बुलाया है...?"


यही सवाल उसके ज़ेहन में बार-बार घूम रहा था।


कुछ ही लम्हों बाद वह दादी अम्मी के कमरे के बाहर पहुँच गई।


उसने अदब से दरवाज़े के सामने रुककर एक गहरी साँस ली...


और अंदर आने की इजाज़त लेने के लिए अपना हाथ धीरे से दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा दिया।



दादी अम्मी के कमरे के दरवाज़े पर पहुँचते ही Shabe Noor के क़दम वहीं थम गए।


क्योंकि अंदर से Umar Jamal की आवाज़ आ रही थी।


“दादी अम्मी... आपकी समझ में नहीं आता—

मैं क्यों करूँ उससे शादी?”


Umar की आवाज़ भारी और ठहरी हुई थी।


“मैंने... कभी उसको उस नज़र से देखा ही नहीं...”


वह आगे कुछ कहना चाहता था,


मगर तभी उसे Shabe Noor की पायल की आहट सुनाई दी।


उसके होंठों पर आए लफ़्ज़ वहीं ठहर गए।


कमरे में एक पल के लिए गहरी ख़ामोशी छा गई।



Shabe Noor की धड़कनें अचानक तेज़ हो गईं।


उसके हाथ अनजाने में काँप उठे।


"शादी...? किसकी शादी की बात हो रही है...?"


वह कुछ समझ नहीं पा रही थी।


दादी अम्मी ने दरवाज़े की तरफ़ देखा और नर्मी से बोलीं,


“बाहर क्यों खड़ी हो, Shabe Noor...? अंदर आ जाओ, बेटा।”


Shabe Noor एक पल के लिए झिझकी।


उसने दरवाज़ा खोला और अदब से सलाम किया।


“अस्सलामु अलैकुम... दादी अम्मी।”


“वअलैकुम अस्सलाम, मेरी बच्ची।”


दादी अम्मी ने मुस्कुराकर उसे अपने पास बुला लिया।


“आओ... यहाँ बैठो।”


Shabe Noor ख़ामोशी से उनके पास जाकर बैठ गई।


उसने एक बार नज़र उठाकर Umar Jamal की तरफ़ देखा।


मगर Umar Jamal ने उसकी तरफ़ देखना भी ज़रूरी नहीं समझा।


उसकी नज़रें अब भी ज़मीन पर टिकी हुई थीं, जैसे वह किसी गहरी सोच में डूबा हो।


Shabe Noor के दिल में एक बार फिर वही टीस उठी।


उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था...


कि अभी-अभी उसने जो अधूरी बात सुनी थी...


वह उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बनने वाली थी।







आगे क्या हो सकता है?

दादी अम्मी Umar Jamal को समझाने की कोशिश करेंगी कि उनका फ़ैसला किसी एक इंसान की नहीं, बल्कि पूरे इख़्तियार ख़ानदान की भलाई से जुड़ा है।

 दूसरी तरफ़ Shabe Noor यह जानने की कोशिश करेगी कि आखिर किस शादी की बात हो रही है और Umar Jamal उसे इतनी सख़्ती से क्यों ठुकरा रहा है। वहीं हवेली में छिपे कुछ पुराने राज़ धीरे-धीरे सामने आने लगेंगे, जो कहानी को एक नए मोड़ पर ले जाएँगे।




इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?

कभी-कभी ज़िंदगी में सबसे मुश्किल जंग अपनों के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि अपनी ख़्वाहिशों और फ़र्ज़ के बीच होती है। हर फ़ैसला जल्दबाज़ी में करने के बजाय उसके पीछे की मजबूरी और सच्चाई को समझना भी उतना ही ज़रूरी है।



Next Short Part

दादी अम्मी की आँखों में नमी उतर आई।

उन्होंने Umar Jamal की तरफ़ देखा और धीमी आवाज़ में कहा,

“अगर तुम्हें इस फ़ैसले की असली वजह पता चल जाए... तो शायद तुम मुझे कभी ग़लत नहीं कहोगे।”

Umar Jamal के चेहरे के भाव बदल गए।

वहीं Shabe Noor की धड़कनें तेज़ हो गईं...

क्योंकि उसे महसूस हो रहा था कि अगले ही पल ऐसा राज़ सामने आने वाला है, जो उसकी पूरी ज़िंदगी बदल देगा...

जारी रहेगा...

Readers ke liye Shukriya Message

Writing

मेरे प्यारे और अज़ीज़ Readers,

आप सभी का दिल की गहराइयों से शुक्रिया, जो आप "राहे बिस्मिल्ल" को इतना प्यार और अपना क़ीमती वक़्त दे रहे हैं। आपकी हर रीड, हर कमेंट और हर दुआ मेरे लिए बहुत मायने रखती है।

उम्मीद है कि आप इसी तरह इस सफ़र में मेरे साथ बने रहेंगे।

इंशा अल्लाह, "राहे बिस्मिल्ल" का अगला भाग 28/07/2026 को प्रकाशित किया जाएगा।

अपना प्यार और दुआएँ यूँ ही बनाए रखिए।

– Afsana Wahid ❤️


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