राहे बिस्मिल्ल भाग 9: Umar Jamal ने निकाह से किया इनकार, Shabe Noor का टूटा दिल | Emotional Hindi Novel






 Shabe Noor


वह दादी अम्मी के कमरे से

सीधे अपने कमरे में आ गई।


बिस्तर पर लेटकर

वह Umar Jamal के बारे में

सोचने लगी—


कि किस तरह

उसने Shabe Noor की

मोहब्बत को

अपने पैरों तले

रौंद दिया था।


वह छत को

घूरती रही,


और उसकी आँखों से

आँसू लगातार

बहते रहे।


कितनी अकेली थी वह…


न कोई भाई,

न बहन,

न वालिदैन—


कोई भी ऐसा नहीं

जो उसे समझ सके।


और जिसे उसने

अपना समझा था,


जिसे अपना सब कुछ माना—


उसी ने

उसे खुद से

दूर कर दिया था।


सोचों का

लंबा दौर

ख़त्म होने का

नाम नहीं ले रहा था।


तभी अचानक

कमरे का दरवाज़ा

बंद होने की आवाज़ आई।


उसने छत से

नज़रें हटाईं।


उसकी नज़र

दरवाज़े की तरफ़ उठी...


और अगले ही पल

उसकी साँसें

एक पल के लिए

थम-सी गईं।


दरवाज़े के सामने...


Umar Jamal

खड़ा था।


उसके एक हाथ में

कमरे के दरवाज़े की

कुंडी थी,


जबकि उसकी

गहरी नज़रें

सिर्फ़ Shabe Noor पर

टिकी हुई थीं।


Shabe Noor

हड़बड़ाकर

बिस्तर पर

उठकर बैठ गई।


उसने फ़ौरन

अपने गालों पर बहे

आँसुओं को

पोंछने की कोशिश की,


मगर तब तक

बहुत देर हो चुकी थी।


Umar Jamal

उसकी भीगी हुई आँखें

देख चुका था।


दोनों के बीच

गहरी ख़ामोशी

छा गई।


न Umar Jamal

कुछ कह पा रहा था...


और न ही

Shabe Noor में

उससे कुछ पूछने की

हिम्मत बची थी।


ब्लैक लेदर जैकेट

और ब्लू जींस में,


हमेशा की तरह

रौबदार और

डैशिंग पर्सनैलिटी का मालिक—


Umar Jamal


दरवाज़े पर

खड़ा था।


उसे अपने कमरे में देखकर

Shabe Noor

सिहर गई।


उसकी आँखें

हैरत से फैल गईं


और वह फ़ौरन

बिस्तर पर बैठ गई।


Umar Jamal की नज़रें

उस पर ठहर गईं।


स्काई ब्लू कढ़ाई वाले सूट में

उसके ख़ूबसूरत,

गोरे हाथ

आस्तीन से झलक रहे थे।


फिटिंग का सूट

उसे और भी

ख़ूबसूरत बना रहा था।


Shabe Noor ने

घबराकर

अपने पास रखा दुपट्टा उठाया


और जल्दी से

सिर पर

संभालकर ओढ़ लिया।


वह बिस्तर से

नीचे उतर आई।


दिल ज़ोर-ज़ोर से

धड़क रहा था।


“आ... आप यहाँ...?”


बेहद डरी हुई आवाज़ में

उसने Umar Jamal से कहा।


कमरे की ख़ामोशी

और गहरी हो गई।


और Umar Jamal

अब भी

दरवाज़े पर

खड़ा था...


जैसे कोई फ़ैसला

लेकर आया हो।


वह धीरे-धीरे

चलता हुआ

Shabe Noor के

और क़रीब आ गया।


“सब तुम्हारी वजह से हो रहा है।”


Umar Jamal

ग़ुस्से से बोला।


“तुम मेरी ज़िंदगी में आई ही क्यों...?


बताओ...


किस तरह मेरी ज़िंदगी से जाओगी...?”


उसका लहजा

सवाल नहीं था...


इल्ज़ाम था।


इस वक़्त वह

Shabe Noor के

बेहद क़रीब खड़ा था।


इतना क़रीब...


कि उसकी साँसों की

गरमाहट तक

Shabe Noor महसूस कर सकती थी।


Shabe Noor

घबरा गई।


उसने डरते हुए

अपने क़दम

पीछे की तरफ़ बढ़ाए।


Umar Jamal के

कड़वे अल्फ़ाज़

बार-बार उसके कानों में

गूँज रहे थे।


उसकी आँखों में

आँसू फिर से

उतर आए।


लेकिन...


इस बार

वह रोई नहीं।


बस ख़ामोशी से

Umar Jamal को देखती रही...


वह मुड़ा।


दरवाज़े की तरफ़

दो क़दम बढ़ाए।


मगर फिर

अचानक रुक गया।


बिना उसकी तरफ़

पलटे ही बोला—


“अगर तुमने

इस निकाह से

इनकार नहीं किया...


तो याद रखना...


मैं ये निकाह

कभी क़ुबूल नहीं करूँगा।”


उसकी आवाज़

बर्फ़ की तरह

ठंडी थी।


“निकाह के दिन भी

अगर मुझसे

'क़ुबूल है' की

उम्मीद रखी गई...


तो मेरा जवाब

'नहीं' होगा।”


हर लफ़्ज़

Shabe Noor के

दिल पर

हथौड़े की तरह

लग रहा था।


उसकी आँखों से

आँसू फिर

बह निकले।


वह चाहकर भी

कुछ नहीं कह सकी।


क्योंकि...


जिस इल्ज़ाम की

वह हक़दार ही नहीं थी,


उसी का बोझ

उसके कंधों पर

रख दिया गया था।


Umar Jamal ने

आख़िरी बार

बिना उसकी तरफ़ देखे

दरवाज़ा खोला।


और बाहर निकल गया।


धड़ाम...!


दरवाज़ा बंद होने की

आवाज़ के साथ ही


Shabe Noor के

सब्र का बाँध

टूट गया।


वह वहीं

फ़र्श पर

घुटनों के बल

बैठ गई।


उसने अपने

मुँह पर हाथ रख लिया,


ताकि उसकी

सिसकियाँ

कमरे से बाहर

ना जा सकें।


“या अल्लाह...”


उसके काँपते हुए

लबों से निकला।


“आख़िर मेरी

क्या ख़ता है...?


जिस रिश्ते के बारे में

मुझे आज तक

कुछ पता भी नहीं था...


उसकी सज़ा

मुझे क्यों मिल रही है...?”


उसने

दोनों हाथ

दुआ के लिए

उठा दिए।


उसकी पलकों से

गिरते आँसू

हथेलियों पर

टूटकर बिखर रहे थे।


और कमरे की

दीवारें...


उसकी ख़ामोश

सिसकियों की

गवाह बनी हुई थीं।



“मैंने…

मैंने कुछ नहीं किया है,”


वह रोते हुए बोली—


“मेरी कोई ग़लती नहीं है…”


उसकी आँखों से

आँसू बेहिसाब

बहने लगे।


“अच्छा?”


Umar की आवाज़

और सख़्त हो गई—


“तुमने कुछ नहीं किया?”


“तो दादी अम्मी से

मना भी तो कर सकती थीं ना

हमारे निकाह के लिए!”


इस बार

उसने Shabe Noor के

कंधों को पकड़ लिया

और ग़ुस्से में

हल्का-सा झकझोर दिया।



“आह…”


Shabe Noor के मुँह से

दर्द भरी आवाज़

निकल गई।


वह नाज़ुक-सी लड़की

दर्द से

कराह उठी।


“Umar Jamal… प्लीज़…”


उसकी आवाज़ टूट रही थी—


“मुझे दर्द हो रहा है…”


उसी पल

Umar के हाथ

जैसे वहीं

जम गए।


एक पल के लिए

उसके चेहरे पर

ग़ुस्सा नहीं—


हैरानी थी।


शायद

उसे पहली बार

एहसास हुआ था

कि वह किस हद तक

आ चुका है।


कमरे में

गहरी ख़ामोशी

छा गई।


सिर्फ़

Shabe Noor की सिसकियाँ थीं…


और

Umar की

तेज़ चलती साँसें।


क्योंकि

कभी-कभी

ग़ुस्सा

सिर्फ़ सामने वाले को नहीं—


ख़ुद को भी

बेनक़ाब कर देता है।


“You hurt me, Umar Jamal…”


Shabe Noor की आवाज़

टूटती हुई निकली—


“प्लीज़…

मुझे छोड़ दो।”


यह सुनते ही

जैसे Umar को

होश आ गया हो।


उसके हाथ

फ़ौरन ढीले पड़ गए।


“I’m sorry…”


उसने हल्की आवाज़ में कहा—


“मुझसे ग़लती हो गई।”


वह एक क़दम पीछे हटा।


उसकी आवाज़ में

अब ग़ुस्सा नहीं था,


बस उलझन थी।


“देखो… प्लीज़,

मेरी बात समझने की कोशिश करो।”


Umar Jamal बोला—


“मैं तुमसे निकाह

नहीं कर सकता।


क्योंकि मैंने कभी

तुम्हें उस नज़र से

देखा ही नहीं…”


यह बात कहते हुए

उसे अपनी ग़लती का

एहसास हो चुका था,


लेकिन

उसके लफ़्ज़

अब भी

चुभने वाले थे।


Shabe Noor ने

आँसू पोंछने की

कोशिश की।


“Umar साहब…”


वह काँपती आवाज़ में बोली—


“प्लीज़…

आप मेरे कमरे से

बाहर चले जाइए।


आप मेरी इजाज़त के बिना

मेरे कमरे में

दाख़िल हुए हैं।”


उसकी आवाज़ में

दर्द भी था


और

ख़ुद्दारी भी।


“मुझे भी

कोई शौक़ नहीं

तुम्हारे कमरे में आने का,”


Umar

झुंझलाकर बोला—


“और ना ही

मुझे तुम्हें देखना

पसंद है।”


ये लफ़्ज़

Shabe Noor के दिल में

तीर की तरह

उतर गए।


“मैं तो सिर्फ़

ये कहने आया था,”


वह आगे बोला—


“कि तुम

इस निकाह से

अपनी तरफ़ से

इनकार कर दो।


तुम्हारी बात का

दादी अम्मी पर

बहुत असर होगा।


उनकी नज़रों में

तुम्हारी अहमियत है—


अपने इकलौते पोते से भी ज़्यादा।”


वह मुड़ा...


“मैं जा रहा हूँ,”


दरवाज़े की तरफ़ बढ़ते हुए बोला—


“बस याद रखना—

इस निकाह से

इनकार होना चाहिए।”


यह कहकर


Umar Jamal


कमरे से बाहर

चला गया।


दरवाज़ा बंद हुआ

तो जैसे


Shabe Noor के सब्र का

दरवाज़ा भी

टूट गया।


वह बिस्तर के किनारे

ढह-सी गई

और फूट-फूटकर

रोने लगी।


तकिए में

मुँह छुपाए

उसके कंधे

हिल रहे थे।


क्योंकि

सबसे ज़्यादा दर्द

वहाँ होता है—


जहाँ

आपकी ख़ामोश मोहब्बत को

“बेमानी”

कह दिया जाए।


और उस रात


Shabe Noor ने


सिर्फ़ आँसू नहीं बहाए—


उसने

अपने कई ख़्वाब

ख़ामोशी से

दफ़्न कर दिए।


---


वह कैफ़े में अकेली बैठी थी।


यही वह कैफ़े था जहाँ वह अक्सर हया के साथ आया करती थी। दोनों घंटों यहाँ बैठकर बातें किया करती थीं—कब कई घंटे बीत जाते, पता ही नहीं चलता था।


आज वही कुर्सी, वही टेबल…


लेकिन सामने बैठने वाली हया नहीं थी।


रमना की आँखें आँसुओं से भीग चुकी थीं।


“Excuse me…”


तभी उसके पीछे से आवाज़ आई।


रमना ने पलटकर देखा—


सामने वही वेटर था, जो अक्सर हया और रमना का ऑर्डर लिया करता था।


“अरे मैडम! आप?”


रमना को देखकर वह ख़ुशी से बोला।


काफ़ी वक़्त बाद रमना इस कैफ़े में आई थी।


रमना ने हल्की-सी मुस्कान दी।


“काफ़ी वक़्त बाद तशरीफ़ लाई हैं आप… और आपके साथ जो दूसरी मैडम आती थीं, वो कहाँ हैं?”


वह हया को ढूँढते हुए बोला।


तभी रमना की आँख से एक आँसू फिसल पड़ा।


“वो… वो अब नहीं आएँगी।”


उसने अपने आँसुओं पर ज़ब्त करने की कोशिश की।


“ओह… मतलब कहीं दूर चली गई हैं?”


वेटर ने  पूछा।


रमना ने बिना कुछ बोले सिर हिला दिया।


“ठीक है मैडम, मैं आपका फ़ेवरेट ऑर्डर लेकर आता हूँ।”


वह मुस्कुराकर ऑर्डर लेने चला गया।


रमना चारों ओर देखने लगी।


सालों से वह और हया यहाँ आया करती थीं।


इस कैफ़े का हर कोना आज उसे हया की याद दिला रहा था।


“Wow यार! आ गए मेरे फ़ेवरेट कप-केक और चाइनीज़ राइस!”


हया ने हाथ मलते हुए कहा।


“I don’t like ये कप-केक और चाइनीज़ राइस… तुम ही खाओ। मैं तो अपना बर्गर ले लेती हूँ।”


रमना ने मुस्कुराते हुए बर्गर उठाया था।


“रमना यार, तू एकदम बोर है… मेरी तरह ज़िंदादिल नहीं है।”


हया ने चाइनीज़ राइस खाते हुए कहा।


“मुझे ज़िंदादिल बनने की ज़रूरत नहीं… तुम हो ना मेरे साथ, वही काफ़ी है।”


रमना ने हया के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा।


“हया, तुम्हें पता है ना… मैं तुम्हारे बिना अधूरी हूँ। जो ख़ूबियाँ तुममें हैं, ज़रूरी नहीं कि वो सब मुझमें भी हों।”


“ओह मैडम! ख़ुद के अंदर सारी ख़ूबियाँ होनी चाहिए मुकम्मल होने के लिए।


कल को अगर मेरी शादी हो गई और हम अलग हो गए, तो तुम क्या करोगी?”


हया ने मज़ाक में कहा।


“ये सब मैं नहीं जानती… बस इतना पता है कि तुम्हारे बिना मेरा कुछ नहीं है। मैं अधूरी हूँ।”


और दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ी थीं।


“मैडम, आपका ऑर्डर…”


वेटर की आवाज़ पर रमना यादों से बाहर आई।


“ओह… थैंक यू।”


उसने फिर से अपने आँसुओं को रोकते हुए प्लेट ली।


“मैडम, आप...”






इस कहानी में आगे क्या हो सकता है?

Umar Jamal के कमरे से जाने के बाद Shabe Noor पूरी रात रोती रहेगी, लेकिन वह किसी से अपनी तकलीफ़ बयान नहीं करेगी। दूसरी तरफ़ Umar Jamal भी अपने फ़ैसले और दादी अम्मी की बातों के बीच बुरी तरह उलझ जाएगा। दादी अम्मी दोनों को बुलाकर उस राज़ का पर्दा उठाने की कोशिश करेंगी, जिसकी वजह से वह इस निकाह पर ज़ोर दे रही हैं। जैसे-जैसे सच्चाई सामने आएगी, रिश्तों की असली परीक्षा शुरू होगी।

इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?

कभी-कभी अधूरी जानकारी के आधार पर लिया गया फ़ैसला कई बेगुनाह दिलों को तकलीफ़ पहुँचा देता है। किसी भी रिश्ते में ग़ुस्से से पहले सच जानना, एक-दूसरे की बात सुनना और सम्मान बनाए रखना बहुत ज़रूरी होता है।

Next Short Part

Umar Jamal अपने कमरे में पहुँचकर बेचैनी से इधर-उधर टहलने लगा।

उसकी आँखों के सामने बार-बार Shabe Noor के आँसू आ रहे थे।

“क्या मैंने... सच में हद पार कर दी?”

उसने पहली बार ख़ुद से यह सवाल किया।

उधर Shabe Noor ने अपने रब के सामने हाथ उठा दिए।

उसे नहीं मालूम था...

कि उसकी एक दुआ बहुत जल्द पूरी हवेली की तक़दीर बदलने वाली थी...

जारी रहेगा...

पेश है आपके पाठकों के लिए संदेश:

Writing

मेरे प्यारे Readers,

"राहे बिस्मिल्ल" को अपना प्यार, वक़्त और दुआएँ देने के लिए आप सभी का दिल से शुक्रिया। आपकी हर रीड, हर कमेंट और हर हौसला-अफ़ज़ाई मुझे बेहतर लिखने की प्रेरणा देती है।

उम्मीद है कि आप आगे भी इसी तरह इस सफ़र का हिस्सा बने रहेंगे।

इंशा अल्लाह, इस कहानी का अगला भाग 01/08/2026 को प्रकाशित किया जाएगा।

अपनी दुआओं में याद रखिए और कहानी पर अपनी राय ज़रूर साझा कीजिए।

– Afsana Wahid 🌸




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