राहे बिस्मिल्ल | हया की याद, शबे नूर की मोहब्बत और दिल को छू लेने वाला दर्द | Part 4
रामना अपने कमरे में खड़ी थी।
कॉलेज जाने के लिए बिल्कुल तैयार...
हल्का-सा मेकअप, नोर्मल-सी ख़ुशबू और वही आसमानी नीली ड्रेस, जिसकी तारीफ़ हया हर बार मुस्कुराकर किया करती थी।
"यार रामना... ये रंग तुम पर इतना प्यारा लगता है कि नज़र ही नहीं हटती।"
हया के कहे हुए वही अल्फ़ाज़ जैसे आज भी उसके कानों में गूँज रहे थे।
रामना ने आईने में खुद को देखा, मगर आज उसे अपने चेहरे पर मुस्कान की जगह सिर्फ़ एक खालीपन नज़र आ रहा था।
उसने ड्रेस की सिलवटें ठीक कीं और जैसे ही मेज़ पर रखी अपनी कलाई घड़ी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया...
उसकी नज़र उसके बिल्कुल पास रखी दूसरी घड़ी पर पड़ गई।
वही घड़ी...
जिसे हया ने ज़िद करके दोनों के लिए एक जैसी खरीदा था।
उस दिन कितनी देर तक दोनों दुकान में बहस करती रही थीं।
"एक जैसी घड़ियाँ क्यों?" रामना ने पूछा था।
हया ने हँसकर उसका हाथ पकड़ लिया था।
"ताकि जब भी तुम अपनी घड़ी देखो... तुम्हें मेरी याद आए। और जब मैं अपनी घड़ी देखूँ... मुझे तुम याद आओ।"
उस वक़्त दोनों देर तक हँसती रही थीं...
लेकिन आज वही याद रामना के सीने में दर्द बनकर उतर गई।
उसने काँपते हाथों से दूसरी घड़ी उठाई।
उसकी उंगलियाँ घड़ी के शीशे पर धीरे-धीरे फिरने लगीं, जैसे वो उस चीज में हया की मौजूदगी तलाश कर रही हो।
उसकी पलकों पर नमी उतर आई।
दिल इतना बोझिल हो गया कि जैसे किसी ने साँस लेना भी मुश्किल कर दिया हो।
और फिर...
उसे वही दिन याद आ गया—
यादों का मंज़र
"ओह मेरी जान... तुम्हारे बिना मैं कहीं नहीं जा सकती!"
हया ने हँसते हुए रामना का हाथ पकड़ लिया था।
"चलो... जल्दी तैयार हो जाओ, आज लेट हो गए तो सर फिर से डाँटेंगे।"
रामना कंबल में खुद को और छिपाते हुए बोली—
"यार हया... तुम भी ना। जाना तुम्हें है तो चली जाओ, मैं तो आज बिल्कुल नहीं जाने वाली।"
हया ने बनावटी नाराज़गी से होंठ फुला लिए।
"अच्छा... ठीक है। फिर मैं अकेली जा रही हूँ। बाद में मत कहना कि मुझे छोड़कर चली गई।"
रामना ज़ोर से हँस पड़ी थी।
"ड्रामा क्वीन कहीं की..."
हया भी हँस दी थी।
"याद रखना... अगर कभी मैं सच में चली गई ना... तब बहुत रोओगी।"
"चुप करो... ऐसी बातें मत किया करो।"
रामना ने तुरंत उसका मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया था।
दोनों फिर खिलखिलाकर हँस पड़ी थीं...
उन्हें कहाँ मालूम था...
मज़ाक में कहे गए यही अल्फ़ाज़ एक दिन हक़ीक़त बनकर रामना की पूरी दुनिया उजाड़ देंगे।
वापस आज में,,,
आईने में खुद को देखते हुए रामना की आँखें भर आईं।
उसने काँपते होंठों से बहुत धीरे फुसफुसाकर कहा—
"देखो हया... तुमने अपनी बात सच साबित कर दी।
आज सचमुच मुझे छोड़कर चली गई हो..."
आँसू उसके गालों पर ख़ामोशी से ढुलक पड़े।
उसने दूसरी घड़ी को बहुत एहतियात से वापस उसी जगह रख दिया...
जैसे वो कोई बेहद क़ीमती अमानत हो।
फिर उसने अपनी कलाई में अपनी घड़ी बाँधी...
एक गहरी साँस ली...
आँखों के आँसू पोंछे...
मेज़ पर रखी अपनी कार की चाबी उठाई...
और आख़िरी बार पलटकर कमरे को देखा।
ऐसा महसूस हो रहा था...
जैसे इस कमरे की हर चीज़ में हया की हँसी अब भी बसी हुई हो।
हर कोना...हर दीवार...हर याद...
उसे रोक लेना चाहती थी।
मगर उसने खुद को सँभाला।
चेहरे पर बनावटी मुस्कान लाई...
और कमरे से बाहर निकल गई...
जैसे हर कदम के साथ वो अपनी एक और याद को पीछे छोड़ने की नाकाम कोशिश कर रही हो।
दूसरीे तरफ,,,,
शबनूर ने कमरे का दरवाज़ा एक झटके से बंद किया और उसी दरवाज़े से पीठ टिकाकर खड़ी हो गई।
उसकी साँसें बेतरतीब चल रही थीं, जैसे किसी ने उसके सीने से सुकून छीन लिया हो। आँखें लाल थीं और पलकों पर ठहरे आँसू किसी भी लम्हे टूटकर बिखर जाने को बेकरार थे।
उसने काँपते होंठों से बमुश्किल कहा—
“उमर जमाल... आप आख़िर क्यों नहीं समझते?”
उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मानो कमरे की दीवारें भी उसे सुनने के लिए ख़ामोश हो गई हों।
“मेरे दिल में आपके सिवा कोई नहीं है... कोई भी मेरी आँखों में देखकर मेरे दिल का हाल पढ़ लेता है, फिर आप ही क्यों नहीं पढ़ पाते? क्या मेरी ख़ामोशी इतनी बेअसर है... या मेरी मोहब्बत इतनी कमज़ोर?”
ये कहते-कहते उसकी आवाज़ भर्रा गई।
उसके लंबे, रेशमी बाल बिखरकर उसकी पीठ पर फैल गए थे, जैसे हर लट उसके दिल के दर्द की गवाही दे रही हो।
उसकी बड़ी-बड़ी नीली आँखें आँसुओं से चमक रही थीं।
ख़ूबसूरत...?
नहीं...
वो उससे कहीं बढ़कर थी।
उसकी मासूमियत, उसका शफ़्फ़ाफ़ चेहरा, लंबा क़द और नफ़ासत से भरा अंदाज़ ऐसा था कि जो एक बार उसे देख ले, कुछ पल के लिए ख़ुद को भूल जाए।
उसने आसमान की तरफ़ नज़र उठाई और भर्राई हुई आवाज़ में दुआ की—
“या अल्लाह... तू गवाह है... हर उस लम्हे का, हर उस धड़कन का जो मैंने उमर जमाल के नाम पर जिया है। तू गवाह है उन पाक जज़्बात का, जिनमें कभी रिया नहीं थी... सिर्फ़ मोहब्बत थी। अगर मेरी मोहब्बत सच्ची है, तो एक दिन उन्हें मेरे दिल की आवाज़ ज़रूर सुना देना।”
उसकी पलकों से आँसू ढुलककर गालों पर बह निकले।
वो धीरे-धीरे दरवाज़े से हटकर अपनी आलमारी की तरफ़ बढ़ी।
उसके कदम लड़खड़ा रहे थे, जैसे हर क़दम उसके लिए एक इम्तिहान हो।
उसने काँपते हाथों से आलमारी का दरवाज़ा खोला।
दरवाज़ा खुलते ही...
पूरा हिस्सा उमर जमाल की तस्वीरों से जगमगा उठा।
छोटी-बड़ी...
मुस्कुराती हुई...
संजीदा...
हर तस्वीर में बस वही था।
वही चेहरा...
वही आँखें...
वही शख़्स...
जिसने अनजाने में उसके दिल पर ऐसी हुकूमत कर ली थी कि अब वहाँ किसी और के लिए कोई जगह बाकी नहीं रही थी।
शबे नूर ने बेहद एहतियात से एक तस्वीर उठाई और अपनी उँगलियाँ उसके चेहरे पर फेरने लगी।
उसके होंठों पर एक फीकी-सी मुस्कान उभरी...
ऐसी मुस्कान जिसमें मोहब्बत भी थी, दर्द भी था और इंतज़ार भी।
वो तस्वीर को अपने सीने से लगाकर बहुत धीमे से बोली—
“काश... एक दिन ऐसा आए, जब आप मेरी ख़ामोशी भी सुन लें... मेरी आँखों में छुपी मोहब्बत भी पढ़ लें... और मुझे किसी इज़हार की ज़रूरत ही न पड़े।”
उसकी आँखों से गिरते आँसू तस्वीर पर टपकने लगे।
ऐसा लग रहा था...
मानो उसकी मोहब्बत खुद उन तस्वीरों में समाती चली जा रही हो।
कमरे में गहरी ख़ामोशी थी...
और उस ख़ामोशी में सिर्फ़ एक टूटे हुए दिल की धड़कनों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
रामना गाड़ी चला रही थी, मगर उसका दिमाग कहीं और अटका हुआ था।
हया की आख़िरी बातें अभी भी उसकी रगों में गूंज रही थीं—
“रामना… तुम जानती हो ना, तुम में मेरी जान बसती है…
तुम्हारे बिना मैं नहीं रह सकती…”
इन अल्फ़ाज़ ने उसे अंदर तक हिला दिया था।
स्टेयरिंग पकड़े उसकी उंगलियाँ हल्की-हल्की काँप रही थीं।
उसका ज़ेहन बार-बार उसी लम्हे में लौट जाता… उसी दर्द, उसी मोहब्बत, उसी मुस्कुराहट में, जिसे वक्त उससे हमेशा के लिए छीन चुका था।
उसने एक गहरी साँस लेकर खुद को सँभालने की कोशिश की।
“नहीं रामना… आज तुम्हारी नई नौकरी का पहला दिन है… खुद को मज़बूत बनाना होगा…”
उसने खुद ही खुद से कहा, मगर दिल था कि किसी की बात सुनने को तैयार ही नहीं था।
तभी अचानक—
गाड़ी के सामने से एक नन्ही बच्ची दौड़ती हुई सड़क पार करने लगी।
“ओह शिट…!”
रामना ने पूरी ताक़त से ब्रेक पर पैर दे मारा।
टायर सड़क पर ज़ोर से घिसे और एक तीखी चीख जैसी आवाज़ पूरे माहौल में गूँज उठी।
गाड़ी बच्ची से बस कुछ इंच पहले आकर रुकी।
रामना की साँस जैसे सीने में ही अटक गई।
उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था।
अगर वह एक पल भी देर कर देती…
तो शायद एक मासूम ज़िंदगी उसकी आँखों के सामने खत्म हो जाती।
उसने बिना एक लम्हा गंवाए गाड़ी का दरवाज़ा खोला और तेज़ी से बाहर निकलकर बच्ची की तरफ दौड़ी।
करीब आठ साल की मासूम बच्ची…
हल्के गुलाबी रंग की छोटी-सी फ्रॉक पहने हुए…
डर की वजह से उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर रखी थीं, जैसे अभी भी उसे यक़ीन न हो कि वह महफ़ूज़ है।
उसके छोटे-छोटे हाथ काँप रहे थे और साँसें बुरी तरह उखड़ी हुई थीं।
रामना फौरन उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई।
उसने बेहद नर्मी से बच्ची के कंधों पर हाथ रखा और काँपती आवाज़ में बोली—
“हाय… बेटा… तुम ठीक हो ना?”
जैसे ही रामना ने उसे अपने सीने से लगाया…
बच्ची छोटे-छोटे सिसकियों में रो पड़ी।
उसके काँपते हुए नन्हे कंधे रामना के दिल में तीर की तरह चुभ रहे थे।
रामना ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा।
“श्श्श… रोओ मत… सब ठीक है। कहीं चोट तो नहीं लगी?”
बच्ची ने आँसुओं के बीच धीरे से सिर हिलाकर ‘ना’ कहा।
मगर उसके आँसू अभी भी थमने का नाम नहीं ले रहे थे।
रामना ने उसके गालों से आँसू साफ़ किए और मुस्कुराने की कोशिश करते हुए फिर पूछा—
“पक्का ठीक हो न?”
इस बार बच्ची ने हल्का-सा ‘हाँ’ में सिर हिला दिया…
लेकिन उसकी छोटी-सी मुट्ठी अब भी रामना की शर्ट को कसकर पकड़े हुए थी।
शायद उसे उस अजनबी लड़की में भी अपनी माँ जैसी पनाह महसूस हो रही थी।
रामना ने बेहद प्यार से पूछा—
“तुम अकेले सड़क पार क्यों कर रही थीं, बेटा?”
बच्ची ने अपनी भीगी हुई पलकों को झपकाते हुए जवाब दिया—
“मेरे बाबा… उधर हैं। मैं उनके पास जा रही थी… जल्दी थी… इसलिए मैंने गाड़ी को आते हुए नहीं देखा…”
रामना ने एक गहरी साँस ली।
फिर उसने बच्ची का छोटा-सा हाथ अपने हाथ में लिया और प्यार से मुस्कुराकर बोली—
“बेटा… आगे से कभी भी ऐसे अकेले सड़क पार मत करना। पहले दोनों तरफ देखना… फिर किसी बड़े का हाथ पकड़कर सड़क पार करना… ठीक है?”
बच्ची ने इस बार बिना कुछ कहे मासूमियत से सिर हिला दिया।
उसकी आँखों में डर अब थोड़ा कम हो चुका था।
रामना ने उसके बिखरे हुए बाल कान के पीछे किए और मुस्कुराकर बोली—
“चलो… मैं तुम्हें तुम्हारे बाबा के पास छोड़ देती हूँ।”
बच्ची ने अपना छोटा-सा हाथ रामना की हथेली में रख दिया।
रामना उसे लेकर सड़क के दूसरी तरफ बढ़ने लगी।
मगर…
रामना वक़ार इस बात से बिल्कुल बेख़बर थी कि कुछ ही फ़ासले पर एक शख़्स खड़ा उसे गहरी, सख़्त और ग़ुस्से भरी निगाहों से देख रहा था।
उसकी आँखों में नफ़रत थी… या कोई पुराना दर्द…
यह समझ पाना नामुमकिन था।
जैसे-जैसे रामना उस बच्ची का हाथ थामे आगे बढ़ रही थी…
वैसे-वैसे उस अनजान शख़्स की मुट्ठियाँ और ज़्यादा भींचती चली जा रही थीं।
उसकी जबड़े की नसें तन चुकी थीं।
चेहरे पर ऐसा ग़ुस्सा था, मानो रामना की यह मामूली-सी हरकत भी उसके अंदर दबी किसी पुरानी आग को फिर से भड़का गई हो।
वो बस ख़ामोशी से खड़ा था…
मगर उसकी नज़रें एक पल के लिए भी रामना वक़ार से नहीं हट रही थीं।
ऐसा लग रहा था…
मानो यह मुलाक़ात सिर्फ़ एक इत्तेफ़ाक़ नहीं, बल्कि किसी नई कहानी… और एक नए तूफ़ान की शुरुआत थी।
आगे क्या हो सकता है?
क्या रामना अपने दिल के दर्द को छिपाकर नई ज़िंदगी की शुरुआत कर पाएगी? क्या मिस्टर इख़्तियार का रिश्ता उसकी ज़िंदगी में नई खुशियाँ लाएगा, या अतीत की यादें उसे आगे बढ़ने नहीं देंगी? दूसरी तरफ़, क्या शबे नूर की पाक मोहब्बत कभी उमर जमाल तक पहुँच पाएगी, या उसका इश्क़ सिर्फ़ दुआओं और आँसुओं तक ही महदूद रह जाएगा? आने वाले हिस्सों में कई ऐसे राज़ सामने आएँगे जो पूरी कहानी का रुख़ बदल सकते हैं।
इस हिस्से से हमें क्या सीख मिलती है?
कभी-कभी सच्ची मोहब्बत का सबसे बड़ा इम्तिहान सब्र और ख़ामोशी होती है। हर एहसास का इज़हार अल्फ़ाज़ से नहीं होता, और हर बिछड़ने वाला इंसान दिल से कभी दूर नहीं होता। हमें अपने रिश्तों की क़द्र तब तक करनी चाहिए, जब तक वो हमारे साथ हैं।
Next Short Part
उधर रामना अपने नए सफ़र की तरफ़ पहला क़दम बढ़ा रही होगी, जबकि दूसरी तरफ़ उमर जमाल एक ऐसे फ़ैसले के सामने खड़ा होगा जो न सिर्फ़ उसकी, बल्कि शबे नूर की पूरी ज़िंदगी बदल सकता है। क्या दोनों की तक़दीरें एक-दूसरे से टकराने वाली हैं?
Readers ke liye Shukriya Message
मेरे अज़ीज़ और मोहतरम पाठकों,
आप सभी का दिल की गहराइयों से शुक्रिया, जो आप "राहे बिस्मिल्ल" को इतना प्यार दे रहे हैं। आपकी हर रीड, हर कमेंट और हर दुआ मेरे लिए बहुत क़ीमती है। उम्मीद है कि आप आगे भी इसी तरह इस सफ़र का हिस्सा बने रहेंगे।
इंशा अल्लाह, "राहे बिस्मिल्ल" का अगला पार्ट 19/07/2026 को रात 11:00 बजे प्रकाशित किया जाएगा।
तब तक अपनी दुआओं में याद रखिएगा। 🤍🌸



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